राम मनोहर लोहिया डिजाइन फोटो
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राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि: तस्वीरों में देखिए समाजवाद के सबसे बेबाक नेता का सफ़र

Ram Manohar Lohia Death Anniversary: राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर देखें तस्वीरों में उनका सफ़र भारत छोड़ो आंदोलन, गोवा मुक्ति और संसद में उठाए गए सवाल, जिन्होंने समाजवादी राजनीति को दिशा दी।

अंकिता पटेल
12 अक्टूबर 1967 को देश ने अपने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिन्होंने सत्ता से ज़्यादा विचारों को अहमियत दी। स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक और बेबाक सांसद लोहिया की 59वीं पुण्यतिथि पर देखिए उनके जीवन की प्रमुख झलकियाँ।
23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर (वर्तमान अंबेडकर नगर) में जन्मे लोहिया के पिता हीरालाल गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे। बचपन में ही माँ का साया सिर से उठ गया। पिता के साथ आंदोलनों और सभाओं में जाने से उनके मन में कम उम्र में ही देश और समाज के प्रति संवेदना जागी।
लोहिया ने मुंबई, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कोलकाता में शिक्षा पाई। उच्च अध्ययन के लिए वे जर्मनी गए और बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। उनके शोध का विषय गांधीजी का नमक सत्याग्रह था। 1933 में भारत लौटकर उन्होंने खुद को पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन को सौंप दिया।
1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में लोहिया की अहम भूमिका रही। वे इसके प्रमुख संस्थापकों में गिने जाते हैं। इसका मक़सद आज़ादी की लड़ाई को गरीब, किसान और मज़दूर के सवालों से जोड़ना था। बाद में उन्होंने कांग्रेस की विदेश नीति से जुड़े विभाग में भी काम किया।
1942 में गांधीजी की गिरफ़्तारी के बाद जब बड़े नेता जेल में थे, तब लोहिया भूमिगत होकर आंदोलन की कमान संभालते रहे। उन्होंने ऊषा मेहता और साथियों के साथ गुप्त कांग्रेस रेडियो चलाने में योगदान दिया। इससे देश के कोने-कोने तक आंदोलन की ख़बरें और संदेश पहुँचते रहे।
1944 में गिरफ़्तारी के बाद लोहिया को लाहौर किले में रखा गया। बताया जाता है कि वहाँ उन्हें कठोर यातनाएँ दी गईं। इसके बावजूद उन्होंने अपने विचार और संकल्प से समझौता नहीं किया। लगभग दो साल की कैद के बाद 1946 में वे रिहा हुए।
18 जून 1946 को लोहिया ने गोवा के मडगाँव में पुर्तगाली शासन के विरुद्ध नागरिक अधिकारों की आवाज़ बुलंद की। पाबंदियों के बावजूद उन्होंने सभा की और गिरफ़्तारी दी। इसी घटना ने गोवा की आज़ादी की लड़ाई को नई ऊर्जा दी। आज भी 18 जून गोवा में क्रांति दिवस के रूप में याद किया जाता है।
लोहिया ने सात क्रांतियों का विचार दिया: स्त्री-पुरुष समानता, रंगभेद का अंत, जातिगत ऊँच-नीच का खात्मा, विदेशी प्रभुत्व का विरोध, आर्थिक गैर-बराबरी की समाप्ति, निजी जीवन में अनुचित दख़ल का विरोध और हथियारों के बजाय सत्याग्रह की राह। उनके लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ़ शासन बदलना नहीं, समाज बदलना था।
"पिछड़ा पावे सौ में साठ" का नारा लोहिया की पहचान बना। वे पिछड़ों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को नेतृत्व में अधिक भागीदारी देने के पक्षधर थे। साथ ही वे चाहते थे कि शासन-प्रशासन और शिक्षा में अंग्रेज़ी की जगह भारतीय भाषाओं को सम्मान मिले, ताकि आम आदमी व्यवस्था से जुड़ सके।
1963 में फ़र्रुख़ाबाद उपचुनाव जीतकर लोहिया लोकसभा पहुँचे। संसद में उन्होंने आम आदमी की आमदनी और सरकारी खर्च के बीच के फ़र्क़ पर तीखी बहस छेड़ी, जिसे तीन आना बनाम पंद्रह आना की बहस के रूप में जाना जाता है। 1967 में वे कन्नौज से सांसद चुने गए। उन्होंने "मैनकाइंड" और "जन" पत्रिकाओं का संपादन किया और "व्हील ऑफ़ हिस्ट्री" तथा "मार्क्स, गांधी एंड सोशलिज़्म" जैसी पुस्तकें लिखीं।
57 वर्ष की उम्र में नई दिल्ली में लोहिया का निधन हो गया। आज दिल्ली का राम मनोहर लोहिया अस्पताल उनके नाम से जाना जाता है। उनके बाद की समाजवादी राजनीति के कई नेताओं ने उन्हें अपना वैचारिक मार्गदर्शक माना। बराबरी, सामाजिक न्याय और जन-भागीदारी पर उनके विचार आज भी बहस और राजनीति का हिस्सा हैं।

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