नेताजी सुभाष चंद्र बोस डिजाइन फोटो
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तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ICS छोड़ने से आजाद हिंद सरकार तक; तस्वीरों में देखिए पूरा सफर

Subhas Chandra Bose History: नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन की 10 ऐतिहासिक झलकियाँ देखिए: कटक के बचपन और आईसीएस से इस्तीफे से लेकर महान पलायन, आजाद हिंद फौज और आजाद हिंद सरकार तक।

अंकिता पटेल
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा की थी। इसकी 83वीं वर्षगाँठ पर देखिए उनके जीवन की 10 ऐसी झलकियाँ, जो बताती हैं कि एक मेधावी विद्यार्थी कैसे देश का सबसे साहसी क्रांतिकारी बना।
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (ओडिशा) में हुआ था। पिता जानकीनाथ बोस वकील थे और माँ प्रभावती देवी। वे चौदह संतानों में नौवें थे। बचपन से ही उनमें अनुशासन, सेवा-भाव और देश के प्रति संवेदनशीलता दिखने लगी थी। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उन पर गहरा असर माना जाता है।
कटक के रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल से पढ़ाई के बाद वे कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज पहुँचे। वहाँ एक अंग्रेज प्रोफ़ेसर के भारतीयों के प्रति अपमानजनक व्यवहार का विरोध करने पर उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक किया और 1919 में आगे की पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज गए।
1920 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की परीक्षा में चौथा स्थान पाया, जो उस दौर में बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी उन्हें मंजूर नहीं थी। अप्रैल 1921 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और भारत लौटकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
भारत लौटकर वे चित्तरंजन दास (देशबंधु) के मार्गदर्शन में राजनीति में आए। 1924 में वे कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने और 1930 में कलकत्ता के मेयर चुने गए। अंग्रेजों ने उन्हें कई बार जेल भेजा, जिनमें बर्मा की मांडले जेल भी शामिल है, जहाँ उनकी सेहत बिगड़ गई थी।
1938 में हरिपुरा अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में दोबारा निर्वाचित हुए। गांधीजी और कांग्रेस नेतृत्व से रणनीति पर मतभेद के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया। मई 1939 में उन्होंने "फॉरवर्ड ब्लॉक" की स्थापना की, ताकि स्वतंत्रता की लड़ाई को और तेज किया जा सके।
1941 की शुरुआत में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कलकत्ता में उनके घर में नज़रबंद कर रखा था। जनवरी 1941 में वे पठान का वेश धरकर चुपचाप निकल गए। उन्होंने गोमो (वर्तमान झारखंड) और पेशावर होते हुए अफगानिस्तान के काबुल का रास्ता पकड़ा। इसे आजादी की लड़ाई की सबसे रोमांचक घटनाओं में गिना जाता है।
काबुल से होते हुए वे मास्को और फिर 1941 में बर्लिन पहुँचे। वहाँ उन्होंने "फ्री इंडिया सेंटर" बनाया और "आजाद हिंद रेडियो" के ज़रिए भारत और विदेश में बसे भारतीयों तक संदेश भेजे। बर्लिन में भारतीय साथियों और सैनिकों ने उन्हें सम्मान से "नेताजी" कहना शुरू किया, जो बाद में उनकी स्थायी पहचान बन गया।
1943 में वे जर्मन पनडुब्बी से रवाना हुए और हिंद महासागर में जापानी पनडुब्बी में सवार होकर दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे। जुलाई 1943 में सिंगापुर आकर उन्होंने आजाद हिंद फौज की कमान सँभाली और "दिल्ली चलो" का नारा दिया। उन्होंने महिलाओं की "रानी झाँसी रेजिमेंट" भी बनाई, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल को मिली।
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा की और खुद इसके प्रमुख बने। दिसंबर 1943 में अंडमान में तिरंगा फहराया गया, जिसे उन्होंने "शहीद" और "स्वराज" द्वीप नाम दिए। 1944 में आजाद हिंद फौज जापानी सेना के साथ इंफाल की ओर बढ़ी और मणिपुर के मोइरांग में तिरंगा फहराया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमे चले, जिनके खिलाफ देशभर में जनता खड़ी हुई। नेताजी के निधन को आधिकारिक तौर पर 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई विमान दुर्घटना से जोड़ा गया, पर इस पर आज भी बहस और अलग-अलग राय बनी हुई है। इसके बावजूद "जय हिंद" का उनका नारा और साहस आज भी हर भारतीय को प्रेरित करता है।

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