गुरु रामदास जी फोटो सोर्स-सोशल मीडिया
सिख धर्म के चौथे गुरु, श्री गुरु रामदास जी को अमृतसर की स्थापना और सिख विवाह की लावां परंपरा से विशेष रूप से याद किया जाता है। उनका जीवन सेवा, विनम्रता और भक्ति का संदेश देता है। जानिए उनके जीवन और योगदान से जुड़ी 10 अहम बातें।गुरु रामदास जी का जन्म 1534 में लाहौर के चूना मंडी इलाके में हुआ था। उनका बचपन का नाम भाई जेठा था। कम उम्र में माता-पिता का साया उठ जाने के बाद उनका पालन-पोषण नानी ने किया। आगे चलकर वे गुरु अमरदास जी के संपर्क में आए और उनकी संगत में सेवा करने लगे।गुरु अमरदास जी ने भाई जेठा की सेवा, निष्ठा और गुणों को देखते हुए उन्हें 1574 में गुरु-गद्दी सौंपी। इसके बाद वे सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास जी के रूप में जाने गए। उन्होंने गुरुगद्दी संभालने के बाद सिख समुदाय को संगठित करने और धर्म के संदेश को आगे बढ़ाने का काम किया।गुरु रामदास जी ने 16वीं सदी में एक नए नगर की स्थापना की, जिसे पहले रामदासपुर या चक रामदास के नाम से जाना गया। यही नगर आगे चलकर अमृतसर कहलाया। उन्होंने व्यापारियों और कारीगरों को यहां बसने के लिए आमंत्रित किया, जिससे यह जगह धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनने लगी।गुरु रामदास जी ने अमृतसर में पवित्र सरोवर की खुदाई का काम शुरू करवाया। यह सरोवर आगे चलकर हरमंदिर साहिब परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। उनके प्रयासों ने उस स्थान को आकार दिया, जो आज दुनिया भर के सिखों के लिए आस्था और संगत का प्रमुख केंद्र है।गुरु रामदास जी द्वारा रचित चार लावां सिख विवाह समारोह, आनंद कारज, का अहम हिस्सा हैं। विवाह के दौरान दूल्हा-दुल्हन गुरु ग्रंथ साहिब जी के चारों ओर फेरे लेते हुए लावां का पाठ सुनते हैं। इन पंक्तियों में वैवाहिक जीवन को आध्यात्मिक यात्रा और गुरु की शिक्षाओं से जोड़ने का संदेश मिलता है।गुरु रामदास जी ने अनेक शबद और भक्ति रचनाएं लिखीं, जिनमें ईश्वर-भक्ति, विनम्रता और सेवा जैसे विषय प्रमुख हैं। उनकी बाणी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है और रागों में संकलित है। उनकी रचनाएं आज भी कीर्तन और सिख धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।गुरु रामदास जी ने गुरु का लंगर और निःस्वार्थ सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाया। लंगर में संगत के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं, जो समानता और साझेदारी का संदेश देता है। उनकी शिक्षाओं में अहंकार से दूर रहकर दूसरों की मदद करने पर जोर मिलता है।गुरु रामदास जी ने अपने सबसे छोटे पुत्र गुरु अर्जन देव जी को अगला गुरु नियुक्त किया। गुरु अर्जन देव जी सिख धर्म के पांचवें गुरु बने। इस उत्तराधिकार के साथ सिख परंपरा और समुदाय के विकास का कार्य आगे बढ़ा।