माता सती के 51 शक्तिपीठों का पौराणिक रहस्य (सौ. डिजाइन फोटो)
अजमेर से 11 किमी उत्तर-पश्चिम में पुष्कर के पास गायत्री पहाड़ के निकट गायत्री शक्तिपीठ स्थित है। मान्यता है कि यहां माता की कलाई गिरी थी। इसे मणिदेविक या मणिबंध मंदिर भी कहते हैं। इसकी शक्ति गायत्री और शिव को सर्वानंद कहते हैं। यह मणिदेविका शक्तिपीठ और गायत्री मंदिर के नाम से ज्यादा विख्यात है। यहां पहुंचने के लिए अजमेर तक ट्रेन और बस की सुविधा आसानी से उपलब्ध है। अजमेर से पुष्कर के लिए टैक्सी या रिक्शा मिल जाता है, जबकि निकटतम हवाई अड्डा जयपुर है।राजस्थान के मध्य में स्थित श्री अंबिका शक्ति पीठ, देवी अंबिका को समर्पित एक पवित्र धार्मिक स्थल है, जो दिव्य स्त्री शक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर दुनिया भर से भक्तों को आकर्षित करता है। राजस्थान के विराट नगर में स्थित पापड़ी के शांत गांव में बसा यह मंदिर 51 शक्ति पीठों में से एक है, और माना जाता है कि यहीं पर सती देवी के पैर का बायां अंगूठा गिरा था। ऐतिहासिक रूप से, पापड़ी को पाव पड़ी के नाम से जाना जाता था, जबकि विराट नगर प्राचीन मत्स्य साम्राज्य की राजधानी थी, जिस पर राजा विराट का शासन था। बीजाक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह पीठ ध्यान के लिए शांत वातावरण प्रदान करता है। इसका निकटतम हवाई अड्डा भी जयपुर है।चन्द्रभागा शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक होने के कारण नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में महत्वपूर्ण है। शाक्त दर्शन, जो देवी को सर्वोच्च शक्ति के रूप में मानता है, इस पीठ के महत्व को और भी बढ़ाता है। यह संदेश देता है कि नारी केवल सृष्टि का आधार नहीं, बल्कि शक्ति, ज्ञान और करुणा का भी प्रतीक है। शाक्त दर्शन में देवी को प्रकृति और पुरुष दोनों के रूप में माना जाता है। वह ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहार करने वाली शक्ति हैं। गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। जूनागढ़ के पास हवाई अड्डा है और देश के हर हिस्से से यहां ट्रेनें और बसें आती हैं।महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है करवीरपुर या शिवहरकर शक्तिपीठ, जहां माता की तीन नेत्र गिरी थीं। यहां की शक्ति महिषासुरमर्दिनी तथा भैरव क्रोधीश हैं। पुराणों में इसी कोल्हापुर को करवीर क्षेत्र कहा गया है, जिसका उल्लेख देवीगीता में मिलता है। शिवहरकराय ही वह स्थान है जहां स्वयं भगवान शिव को अपनी प्रियतमा के वियोग में तांडव करना पड़ा और जहां से देवी महिषासुरमर्दिनी के रूप में अवतरित होकर असुरों का संहार करने के लिए तैयार हुईं। यह स्थान अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शिव-शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है। कोल्हापुर सड़क, रेल और वायु मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।त्रिपुरा के उदयपुर के निकट राधा किशोरपुर गांव में माता का दायां पैर गिरा था। इसे त्रिपुर सुंदरी या माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर अगरतला से लगभग 55 किमी दूर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जो कछुए के कूबड़ जैसी दिखती है, इसलिए इसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है। यह असम के कामाख्या मंदिर के बाद उत्तर-पूर्वी भारत में सबसे अधिक दर्शन किया जाने वाला मंदिर है और त्रिपुरा राज्य का नाम इसी मंदिर के नाम पर रखा गया है। इसका निर्माण महाराजा धान्य माणिक्य ने 1501 ईस्वी में बंगाली एक-रत्न शैली में करवाया था। इसका निकटतम हवाई अड्डा अगरतला है और निकटतम रेलवे स्टेशन कुमारघाट है।