भारत के 12 ज्योतिर्लिंग source: Pinterest
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12 Jyotirlinga of India: सोमनाथ से लेकर घृष्णेश्वर तक, जानिए भारत के 12 पावन ज्योतिर्लिंगों का पौराणिक रहस्य

12 Jyotirlinga History Facts: सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों की धार्मिक मान्यता, पौराणिक कथाएं और इतिहास जानिए। हर ज्योतिर्लिंग की खास पहचान और उससे जुड़े रोचक तथ्य पढ़ें।

अंकिता पटेल
गुजरात के प्रभास पाटण में अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति के शाप से मुक्ति पाने के लिए यहां भगवान शिव की आराधना की थी। इतिहास में मंदिर ने कई बार विनाश और पुनर्निर्माण देखा।
आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में कृष्णा नदी के निकट नल्लमाला पहाड़ियों के बीच मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थित है। धार्मिक परंपरा में इसे भगवान शिव और माता पार्वती के श्रीशैल निवास से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार कार्तिकेय के रूठकर पर्वत पर चले जाने के बाद शिव-पार्वती उन्हें मनाने यहां पहुंचे और शिव ने मल्लिकार्जुन रूप में निवास किया।
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है। यहां शिवलिंग को धार्मिक मान्यता में स्वयंभू यानी स्वयं प्रकट माना जाता है। मंदिर का गर्भगृह भूमिगत कक्ष में है और वर्तमान मंदिर में भूमिज, चालुक्य तथा मराठा स्थापत्य का प्रभाव दिखाई देता है। मंदिर की विशेष पहचान प्रसिद्ध भस्म आरती भी है।
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच स्थित मांधाता द्वीप को ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का पवित्र स्थल माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इस क्षेत्र का संबंध ‘ॐ’ की आध्यात्मिक ध्वनि से जोड़ा जाता है। मंदिर की बनावट और नर्मदा के बीच इसका स्थान इसे विशेष बनाते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु ओंकारेश्वर के साथ ममलेश्वर मंदिर के दर्शन भी करते हैं।
झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है और यहां शिव को वैद्यनाथ नाम से पूजा जाता है। धार्मिक कथा में रावण द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या और अपने सिर अर्पित करने का प्रसंग मिलता है; इसी परंपरा से शिव के ‘वैद्य’ रूप की मान्यता जुड़ी है।
महाराष्ट्र के पुणे जिले में सह्याद्रि क्षेत्र के बीच स्थित भीमाशंकर 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। मंदिर की वास्तुकला में नागर शैली के साथ राजस्थानी और गुजराती प्रभाव दिखाई देता है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला और शिव लीला से जुड़े शिल्प देखने को मिलते हैं। ऐतिहासिक स्रोतों में इस तीर्थ और भीमरथी नदी का उल्लेख 13वीं शताब्दी के साहित्य में मिलता है।
तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित रामनाथस्वामी मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। धार्मिक परंपरा के अनुसार लंका जाने से पहले भगवान राम ने भगवान शिव की पूजा की थी, इसलिए यहां शिव को रामनाथस्वामी कहा जाता है। मंदिर अपने विशाल गलियारों और नक्काशीदार स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। परिसर में 22 तीर्थकुंड हैं और मान्यता के अनुसार श्रद्धालु इनके पवित्र जल से स्नान करते हैं।
गुजरात में द्वारका के पास स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। धार्मिक कथा में दारुकावन और शिवभक्त सुप्रिया का प्रसंग मिलता है, जहां भक्त की पुकार पर भगवान शिव प्रकट होकर उसकी रक्षा करते हैं और नागेश्वर रूप में विराजमान होने की मान्यता है। मंदिर परिसर में भगवान शिव की विशाल प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा तट के निकट स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव को विश्वेश्वर या विश्वनाथ रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता में काशी को शिव की नगरी माना गया है और यहां दर्शन का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया जाता है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था।
नासिक के पास ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित त्र्यंबकेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में अनोखा स्थान रखता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा को पृथ्वी पर प्रकट किया, जिसे गोदावरी से जोड़ा जाता है। यहां का ज्योतिर्लिंग तीन मुखों वाला माना जाता है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है।
उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में लगभग 3,580 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धामों में शामिल है। यहां शिव की पूजा शंकु के आकार की प्राकृतिक शिला के रूप में की जाती है, जिसे सदाशिव स्वरूप माना जाता है। धार्मिक कथा में पांडवों द्वारा भगवान शिव की खोज और उनके बैल रूप धारण करने का प्रसंग मिलता है।
महाराष्ट्र के वेरूळ में स्थित घृष्णेश्वर को 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मंदिर का उल्लेख शिवपुराण और स्कंदपुराण से जुड़ी परंपराओं में मिलता है। इतिहास में मंदिर को कई बार नुकसान और पुनर्निर्माण का सामना करना पड़ा। 16वीं शताब्दी में मालोजी भोसले के पुनर्निर्माण और 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है।

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