भारत के दशहरा उत्सव डिजाइन फोटो
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Dussehra festivals in India: कहीं 75 दिन का दशहरा, कहीं नहीं जलता रावण, जानिए भारत के 10 अनोखे दशहरा उत्सव

Unique Dussehra Celebrations: मैसूरु से कुल्लू तक, भारत के 10 अनोखे दशहरा उत्सव देखिए। शाही जंबू सवारी, देवताओं का मेला, 75 दिन का बस्तर दशहरा और जहाँ नहीं जलता रावण, हर परंपरा की अलग कहानी।

अंकिता पटेल
उत्तर भारत में रावण दहन, तो दक्षिण में हाथियों की शोभायात्रा। पहाड़ों पर देवताओं का मेला, तो जंगलों में आदिवासी रथ। विजयादशमी पूरे देश में एक है, पर उसे मनाने के तरीके हर राज्य में अनोखे हैं। चलिए देखें भारत के 10 ऐसे दशहरे, जो परंपरा में सबसे अलग हैं।
कर्नाटक का सरकारी राज्य उत्सव कहलाने वाला मैसूरु दशहरा अपनी शाही भव्यता के लिए मशहूर है। माना जाता है कि इसकी जड़ें विजयनगर साम्राज्य तक जाती हैं और वाडियार राजवंश ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। विजयादशमी पर "जंबू सवारी" निकलती है, जिसमें हाथी पर सजे सुनहरे हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा विराजमान होती है। इन दिनों मैसूरु महल रोशनी से जगमगा उठता है।
जब देश में दशहरा ख़त्म होता है, तब कुल्लू में सात दिन के उत्सव की शुरुआत होती है। ढालपुर मैदान में भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा निकलती है और घाटी के सैकड़ों देवी-देवताओं की पालकियाँ यहाँ पहुँचती हैं। माना जाता है कि यह परंपरा सत्रहवीं सदी में राजा जगत सिंह के समय शुरू हुई। यहाँ रावण के पुतले की बजाय अंतिम दिन "लंका दहन" की रस्म निभाई जाती है।
बस्तर का दशहरा देश का सबसे लंबा दशहरा कहा जाता है, जो लगभग 75 दिन चलता है। यहाँ रावण वध की बजाय बस्तर की आराध्य देवी दंतेश्वरी की पूजा होती है। आदिवासी समुदाय लकड़ी का विशाल रथ खींचते हैं, जिस पर देवी का छत्र सजता है। माना जाता है कि यह परंपरा पंद्रहवीं सदी में बस्तर के राजाओं के समय शुरू हुई।
बंगाल में दशहरा रावण दहन नहीं, देवी दुर्गा की विदाई का दिन है। इसे "बिजोया दशमी" कहा जाता है। विवाहित महिलाएँ माँ की प्रतिमा को सिंदूर लगाकर एक-दूसरे के साथ सिंदूर खेला खेलती हैं और ढाक की धुन पर नृत्य होता है। इसके बाद प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया।
तूतुकुड़ी ज़िले के इस तटीय क़स्बे में मुथारम्मन मंदिर का दशहरा अपनी अलग पहचान रखता है। दस दिन के इस उत्सव में भक्त मन्नत पूरी करने के लिए देवी-देवता, पशु या योद्धा का वेश धरकर निकलते हैं। विजयादशमी की रात समुद्र किनारे महिषासुर वध का मंचन होता है, जिसे देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं।
कोटा का दशहरा मेला राजस्थान के सबसे चर्चित मेलों में गिना जाता है और इसे सवा सौ साल से भी पुराना माना जाता है। मेले में झूले, लोक कला प्रस्तुतियाँ, खान-पान और विशाल रावण दहन का आयोजन होता है। दशहरा मैदान में ऊँचे पुतलों के दहन को देखने दूर-दूर से परिवार उमड़ते हैं।
काशी नरेश के संरक्षण में लगभग दो सदी पहले शुरू हुई मानी जाने वाली रामनगर की रामलीला करीब एक महीने चलती है। इसका मंचन किसी एक मंच पर नहीं, बल्कि रामनगर के अलग-अलग स्थानों पर खुले में होता है, जहाँ दर्शक पात्रों के साथ चलते हुए कथा देखते हैं। 2008 में यूनेस्को ने "रामलीला" को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया।
काँगड़ा ज़िले के बैजनाथ में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। मान्यता है कि रावण ने यहाँ भगवान शिव की तपस्या की थी और शिव ने वरदान दिया था। इसलिए यहाँ के लोग रावण दहन को अशुभ मानते हैं। यह दशहरा दर्शाता है कि एक ही कथा के कितने अलग रूप भारत में बसते हैं।
राजस्थान के जोधपुर के मंडोर को मंदोदरी का मायका माना जाता है। लोक-मान्यता के अनुसार यहाँ रहने वाले कुछ ब्राह्मण समुदाय रावण को अपना दामाद मानते हैं और दशहरे पर उसका शोक मनाते हैं। इस दिन वे रावण दहन से दूरी रखते हैं। यह परंपरा हर समुदाय की अपनी आस्था और स्मृति को दिखाती है।
कुमाऊँ के अल्मोड़ा में दशहरे पर रावण के साथ कुंभकर्ण, मेघनाद और उसके पूरे परिवार के कई रंग-बिरंगे पुतले बनाए जाते हैं। इन्हें ढोल-नगाड़ों के साथ शहर में घुमाया जाता है और रात को दहन किया जाता है। जगह-जगह के ये दशहरे सिखाते हैं कि परंपरा एक है, पर उसके रंग अनेक हैं। आप किस दशहरे में जाना चाहेंगे?

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