Women Reservation Bill Analysis Maharashtra: महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों के बीच सैद्धांतिक सहमति तो बन गई है, लेकिन इसके क्रियान्वयन और भविष्य के परिणामों को लेकर संदेह के बादल अब भी मंडरा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस आरक्षण का वास्तविक लाभ उस 'आधी आबादी' को मिलेगा जो जमीनी स्तर पर संघर्ष कर रही है, या फिर यह केवल शक्तिशाली राजनीतिक परिवारों की महिलाओं के लिए संसद तक पहुँचने का एक आरक्षित मार्ग बनकर रह जाएगा। यह चिंता इसलिए भी जायज है क्योंकि पिछले कुछ दशकों का इतिहास बताता है कि सदन में पहुँचने वाली अधिकांश महिला प्रतिनिधि किसी न किसी मजबूत राजनीतिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति इस 'विरासत वाली सियासत' का सबसे सटीक उदाहरण पेश करती है। राज्य की वर्तमान महिला सांसदों की प्रोफाइल पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि उनके लिए सत्ता का गलियारा कभी अनजान नहीं रहा। बारामती की सांसद सुप्रिया सुले हों, जो दिग्गज नेता शरद पवार की बेटी हैं, या फिर सोलापुर से प्रणीति शिंदे, जिनके पिता सुशील कुमार शिंदे देश के गृह मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं; इन सभी के लिए राजनीति एक पारिवारिक परंपरा की तरह रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आरक्षण का लाभ लेकर एक सामान्य पृष्ठभूमि वाली महिला कभी इन दिग्गजों के सामने खड़ी हो पाएगी?
महाराष्ट्र के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। चंद्रपुर से कांग्रेस सांसद प्रतिभा धनोरकर का राजनीतिक सफर उनके दिवंगत पति सुरेश 'बालुभाऊ' धनोरकर की विरासत से जुड़ा है। इसी तरह, जलगांव की बीजेपी सांसद स्मिता वाघ के पीछे उनके पति उदय वाघ का सांगठनिक आधार रहा है, तो रावेर की सांसद रक्षा खडसे की पहचान उनके ससुर और कद्दावर नेता एकनाथ खडसे से जुड़ी है। मुंबई नॉर्थ सेंट्रल से वर्षा गायकवाड़ भी अपने पिता एकनाथ गायकवाड़ की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। यह सूची दर्शाती है कि बिना किसी 'गॉडफादर' या राजनीतिक उपनाम के महिलाओं के लिए शीर्ष स्तर पर जगह बनाना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
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विधेयक का मूल उद्देश्य संसद में आम महिलाओं की आवाज को बुलंद करना था, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि टिकटों के बंटवारे में पार्टियां आज भी 'जीतने की क्षमता' (Winnability) को आधार बनाती हैं, जो अक्सर बड़े परिवारों के पास ही होती है। यदि आरक्षण लागू होने के बाद भी केवल 'बेटियों और बहुओं' को ही प्राथमिकता दी गई, तो वह महिला वर्ग अछूता रह जाएगा जिसने संघर्ष के दम पर अपनी पहचान बनाई है। यह स्थिति सामाजिक न्याय के उस सिद्धांत के विपरीत होगी जिसके लिए इस ऐतिहासिक कानून की नींव रखी गई है।
एक और बड़ा डर जो विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किया जा रहा है, वह है पंचायतों और नगर निकायों में देखी जाने वाली 'पति-प्रतिनिधि' संस्कृति का विस्तार। अक्सर देखा गया है कि स्थानीय चुनावों में महिला चुनकर तो आती है, लेकिन सारा प्रशासनिक और राजनीतिक कार्य उसके पति या परिवार के पुरुष सदस्य ही संभालते हैं। यदि यही मॉडल संसद में भी दोहराया गया, जहाँ महिला सांसद केवल एक मुखौटा बनकर रह जाएं और शक्ति का केंद्र पुरुष ही बने रहें, तो आरक्षण का मूल उद्देश्य पूरी तरह विफल हो जाएगा। भविष्य की राजनीति के लिए यह अनिवार्य है कि महिलाएं केवल संख्या बल न बनें, बल्कि स्वतंत्र निर्णय लेने वाली सशक्त आवाज के रूप में उभरें।