नासिक ढोंगी बाबा (सोर्स- सोशल मीडिया) 
नासिक

नासिक के पॉश इलाके में तांत्रिक टोटके से डरे उच्च-शिक्षित लोग, अशोक खरात कांड के बाद भी अंधविश्वास बरकरार

Nashik Superstition News: नासिक के एक पॉश कॉर्पोरेट इलाके में तांत्रिक टोटका दिखने से पढ़े-लिखे लोगों में डर फैल गया। अशोक खरात कांड के बाद भी समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी दिख रही है।

रूपम सिंह

Nashik Superstition Ashok Kharat case: ढोंगी बाबा अशोक खरात कांड के उजागर होने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि नासिक शहर और जिला अंधश्रद्धा के इस खतरनाक जाल से मुक्त होने की दिशा में कदम बढ़ाएगा। घटना के विरोध में विभिन्न सामाजिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर आवाज उठाई, प्रशासन को जगाया और जनजागृति की मुहिम शुरू की। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

आज भी जिले के कोने-कोने से छोटे-मोटे ढोंगी बाबाओं के सिर उठाने और जादू-टोने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस मानसिक बीमारी से खुद को पढ़ा-लिखा कहने वाला वर्ग भी अछूता नहीं है।

हाल ही में शहर के एक बेहद पॉश, आधुनिक और वीआईपी इलाके में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने समाज की कथित तार्किक सोच की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। यहां की एक बहुमंजिला कॉर्पोरेट बिल्डिंग के ठीक बाहर, जहां दिनभर शिक्षित, नौकरी-पेशा और कॉर्पोरेट जगत से जुड़े लोगों की भारी आवाजाही रहती है, एक जंगली बूटे की शाख पर लाल कपड़े में बंधी हुई कुछ संदेहास्पद सामग्री लटकी हुई पाई गई।

टोटकों से डरे नागरिक

पहली नजर में ही यह किसी तांत्रिक क्रिया या टोटके का हिस्सा नजर आ रहा था। हैरानी की बात यह नहीं है कि किसी ने वहां टोटका किया, बल्कि हैरानी और शर्म की बात यह है कि उस रास्ते से गुजरने वाले नासिक उच्च-शिक्षित लोगों की प्रतिक्रिया क्या थी। दिनभर सूट-बूट पहने, लैपटॉप बैग टांगे और विज्ञान-तकनीक की बातें करने वाले लोग उस लाल कपड़े को देखकर दूर-दूर से बचकर निकलते दिखाई दिए।

कई लोगों के चेहरों पर साफ तौर पर डर देखा जा सकता था। सवाल यह उठता है कि जो युवा और प्रबुद्ध नागरिक विज्ञान और आधुनिकता के दम पर देश को आगे ले जाने का दावा करते हैं, वे एक लाल कपड़े और कथित टोटके के सामने इतने असहाय और डरे हुए क्यों नजर आए ? क्या हमारी शिक्षा हमें केवल डिग्रियां दे रही है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं?

लोगों की मजबूरी का पाखंडी उठा रहे फायदा

अशोक खरात कांड के बाद से ही अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए काम करने वाले संगठन लगातार सक्रिय हैं। लेकिन जनता का एक बड़ा हिस्सा अब भी इन ढोंगियों के बहकावे में आने से खुद को रोक नहीं पा रहा है। डर, असुरक्षा और रातों-रात चमत्कार की चाहत ने लोगों की सोचने-समझने की क्षमता को कुंद कर दिया है। इसी का फायदा उठाकर गली मोहल्लों में नए-नए ढोंगी पैदा हो रहे हैं जो लोगों की

आस्था और मजबूरी का व्यापार कर रहे हैं। नासिक में जादू-टोना विरोधी कानून लागू होने के बावजूद इस तरह की सरेआम हरकतें कानून को खुली चुनौती है। पुलिस और प्रशासन को केवल बड़ी घटनाओं का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि पॉश इलाकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक नजर रखनी होगी।

जब तक हमारा समाज अक्षरों के ज्ञान के साथ-साथ तार्किक और वैज्ञानिक सोच को अपने जीवन में नहीं उतारेगा, तब तक अशोक खरात जैसे ढोंगी और सड़कों पर लटकते ऐसे अंधविश्वासी टोटके हमारी प्रगति का मजाक उड़ाते रहेंगे। समय आ गया है कि हम अंधविश्वास के इस काले साए को डर से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चेतना की रोशनी से मिटाएं।

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