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गोंदिया जिले में वर्ष 2022 से 2026 तक बेटियों के जन्म के आंकड़े दर्ज किए गए हैं।
जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, प्रति एक हजार बेटों पर 900 से अधिक बेटियों का जन्म हो रहा है।
2022 में 954, 2023 में 985, 2024 में 920, 2025 में 928 और 2026 में अब तक 927 बेटियों का जन्म दर्ज हुआ है।
Gondia Sex Ratio: 'वंश का दीपक बेटा ही होता है' जैसी पुरानी सोच को पीछे छोड़ अब बेटियों के जन्म का स्वागत होने लगा है। बेटी को बोझ समझने वाली मानसिकता में बदलाव आ रहा है। गोंदिया जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान 4,712 बेटियों ने जन्म लिया है। जिला स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, हर साल एक हजार बेटों के मुकाबले 900 से अधिक बेटियों का जन्म हो रहा है।
समाज में लंबे समय से बेटे को बुढ़ापे का सहारा और वंश का वारिस मानने की मानसिकता रही है। इसी सोच के चलते कई बार कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जिससे जन्म के समय लिंगानुपात प्रभावित होता है। लेकिन, शिक्षा और जागरूकता के कारण अब माता-पिता की सोच बदल रही है।
बेटियां भी नौकरी, व्यवसाय, राजनीति, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। कई बेटियां अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभाने के साथ ही अंतिम संस्कार जैसे पारंपरिक दायित्व भी निभा रही हैं। इससे बेटा-बेटी को समान मानने की भावना मजबूत हो रही है। जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में वर्ष 2022 में 954, वर्ष 2023 में 985, वर्ष 2024 में 920, वर्ष 2025 में 928 और वर्ष 2026 में अब तक 927 बेटियों का जन्म दर्ज किया गया है।
शहरी क्षेत्रों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और सोनोग्राफी केंद्रों की उपलब्धता के बीच तकनीक के दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है। बेटे की चाह में गर्भस्थ शिशु का लिंग जानने की गैरकानूनी कोशिशें लिंगानुपात को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में आशा सेविकाओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण, स्वास्थ्य सेवाएं और जनजागृति अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेटे की चाह से जुड़ी मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अभिजीत गोल्हार ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी इलाकों में जन्म के समय लिंगानुपात में गिरावट की चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है। जिले में प्रति एक हजार बेटों पर सालाना 900 से अधिक बेटियों का जन्म दर्ज हो रहा है। उन्होंने बेटियों के जन्म को प्रोत्साहित करने और समाज में समानता की भावना मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बेटा-बेटी के बीच भेदभाव कम होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के कई परिवारों में वंश के लिए बेटा जरूरी मानने की सोच कायम है। बेटे की चाह में अधिक संतान होने से परिवार पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जनजागृति के साथ बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना जरूरी है।