संभाजीनगर जिले की 9 तहसीलों में भूजल स्तर में औसतन 5.40 मीटर की गिरावट।
पैठण तहसील में सर्वाधिक 7.15 मीटर की कमी दर्ज।
सोयगांव में सबसे कम 3.50 मीटर की गिरावट।
मानसून में 453.80 मिमी बारिश, औसत से करीब 22% कम।
आने वाली गर्मियों में पेयजल और खेती के लिए संकट गहराने की आशंका।
Chhatrapati Sambhajinagar Groundwater Level Drop: छत्रपति संभाजीनगर जिले में सितंबर 2026 तक भूजल स्तर पिछले पांच वर्षों के औसत की तुलना में 5.40 मीटर नीचे चला गया है। पैठण में सर्वाधिक 7.15 मीटर की गिरावट दर्ज की गई। मानसून में औसत से 22 प्रतिशत कम बारिश और भूजल के लगातार दोहन से आने वाले दिनों में पेयजल और खेती का संकट बढ़ने की आशंका है।
छत्रपति संभाजीनगर, कम बारिश और भूजल के लगातार दोहन का असर अब जिले के जलस्तर पर साफ दिखाई देने लगा है। मानसून के बाद भी जिले की नौ तहसीलों में भूजल स्तर में औसतन 5.40 मीटर की गिरावट दर्ज की गई है। पैठण तहसील की स्थिति सबसे चिंताजनक है, जहां भूजल स्तर 7.15 मीटर नीचे चला गया है। जलस्तर में इस गिरावट से आने वाले दिनों में पेयजल और खेती के लिए पानी की समस्या गंभीर होने की आशंका है।
सितंबर 2026 के भूजल स्तर की तुलना पिछले पांच वर्षों के औसत से करने पर यह गिरावट सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार, जिले का पिछले पांच वर्षों का औसत भूजल स्तर 4.48 मीटर था, जबकि सितंबर 2026 में यह 9.87 मीटर तक पहुंच गया। इस तरह औसत की तुलना में भूजल स्तर 5.40 मीटर नीचे खिसक गया है।
जिले में भूजल की उपलब्धता पर नजर रखने के लिए 141 निरीक्षण कुएं बनाए गए हैं। इन कुओं में हर चार महीने में जलस्तर मापा जाता है। इसी आधार पर भूजल की स्थिति और संभावित जल संकट का अनुमान लगाया जाता है।
तहसीलवार आंकड़ों के अनुसार, पैठण में पिछले पांच वर्षों का औसत भूजल स्तर 4.08 मीटर था, जो सितंबर 2026 में बढ़कर 11.23 मीटर तक पहुंच गया। यहां 7.15 मीटर की सर्वाधिक गिरावट दर्ज हुई है।
अन्य तहसीलों की स्थिति भी चिंताजनक है। कन्नड़ में 6.18 मीटर, खुलताबाद में 6.02 मीटर, वैजापुर में 5.94 मीटर और सिल्लोड में 5.62 मीटर की गिरावट हुई। फुलंब्री में 4.56 मीटर, गंगापुर में 4.50 मीटर और छत्रपति संभाजीनगर तहसील में 4.05 मीटर की कमी दर्ज की गई। सोयगांव में सबसे कम 3.50 मीटर की गिरावट रही।
इस वर्ष मानसून के दौरान जिले में कुल 453.80 मिमी बारिश हुई, जो औसत वर्षा का करीब 77 प्रतिशत है। यानी बारिश में लगभग 22 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। कम बारिश के कारण जल स्रोतों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाया। दूसरी ओर, विभिन्न जरूरतों के लिए भूगर्भ से लगातार पानी निकाला जा रहा है। इससे भूजल स्तर पर दबाव बढ़ रहा है।
भूजल स्तर में लगातार गिरावट आगामी गर्मियों के लिहाज से चिंता बढ़ा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जुलाई के कुछ दिनों को छोड़कर लगभग पूरे वर्ष टैंकरों से पानी की आपूर्ति करनी पड़ रही है। इसका असर कुओं और बोरवेल के जलस्तर पर भी पड़ रहा है।
ऐसे में उपलब्ध जल स्रोतों का उचित नियोजन, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के उपाय जरूरी हो गए हैं। विशेष रूप से पैठण, कन्नड़, खुलताबाद और वैजापुर जैसी अधिक प्रभावित तहसीलों में बड़े पैमाने पर जलसंधारण कार्य करने की आवश्यकता है। जून से सितंबर के बीच हुई बारिश और भूजल स्तर के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर संभावित जल संकट का आकलन किया जाता है।