डॉल्फिन की गिनती करती टीम फोटो सोर्स- नवभारत
मुरैना

चंबल में डॉल्फिन की गिनती के लिए हाईटेक तकनीक का इस्तेमाल, 7 दिन में 110 से ज्यादा डॉल्फिन चिन्हित

Chambal River Dolphins : चंबल नदी में डब्ल्यूआईआई की टीम ने 7 से 14 अक्टूबर तक गंगा डॉल्फिन का सेंसस किया। हाईटेक उपकरणों से 110 से अधिक डॉल्फिन चिन्हित हुईं। अंतिम आंकड़ों का इंतजार है।

योगेश पाराशर, प्रीतेश जैन

Highlights:

  • चंबल नदी में 7 से 14 अक्टूबर तक डॉल्फिन सेंसस किया गया।

  • डब्ल्यूआईआई देहरादून की 22 सदस्यीय टीम ने आधुनिक उपकरणों से सर्वे किया।

  • सर्वे के दौरान 110 से अधिक डॉल्फिन चिन्हित होने की जानकारी सामने आई।

  • 2022 के पहले सेंसस में चंबल में 250 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं।

  • अल्ट्रासोनिक तरंगों से पानी की गहराई में मौजूद डॉल्फिन की गतिविधियों का पता लगाया गया।

Chambal River Dolphin Census : मुरैना की चंबल नदी में पाई जाने वाली गंगा डॉल्फिन की सटीक संख्या पता लगाने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून की टीम ने दूसरी बार डॉल्फिन सेंसस किया है। 7 अक्टूबर से 14 अक्टूबर तक चले सर्वे में आधुनिक उपकरणों की मदद से डॉल्फिन की गणना की गई।

इस दौरान 110 से अधिक डॉल्फिन चिन्हित होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, डॉल्फिन की वास्तविक संख्या के अंतिम आंकड़े सर्वे के निष्कर्ष सामने आने के बाद स्पष्ट होंगे। चंबल में पहला डॉल्फिन सेंसस 2022 में हुआ था, जिसमें 250 डॉल्फिन गिनी गई थीं।

22 सदस्यीय टीम ने आधुनिक उपकरणों से किया सर्वे

डब्ल्यूआईआई के डॉल्फिन विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार के नेतृत्व में 22 सदस्यीय टीम ने चंबल नदी में सर्वे किया। इसमें जलीयजीव विशेषज्ञों के साथ चंबल घड़ियाल अभयारण्य के दो दर्जन से अधिक कर्मचारियों ने भी सहयोग किया। गणना में शामिल कर्मचारियों को इसके लिए एक दिन का प्रशिक्षण दिया गया था। सर्वे मुरैना-धौलपुर के डांग बसई घाट से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की सीमा में पचनदा घाट तक किया गया। चंबल नदी के इस हिस्से की लंबाई करीब 250 किलोमीटर है। टीम ने सात दिनों में लगभग 130 किलोमीटर क्षेत्र में सर्वे पूरा किया। इसके बाद टीम यमुना नदी में डॉल्फिन की गणना के लिए जुट गई।

तरंगों से पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन का पता

डॉल्फिन की गिनती के लिए टीम ने अल्ट्रासोनिक तरंगों को पकड़ने वाले आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया। इनमें एपी-पॉट और ए-टैग जैसे उपकरण शामिल हैं। इनके जरिए पानी की गहराई में मौजूद डॉल्फिन की गतिविधियों का पता लगाने में मदद मिलती है। उपकरणों की रेंज में डॉल्फिन आने पर उसकी गतिविधि कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देती है। इसके बाद सर्वेयर पुष्टि कर उसे गणना में शामिल करते हैं।

आंखों से गिनना मुश्किल, तरंगों से रास्ता खोजती हैं डॉल्फिन

चंबल में पाई जाने वाली गंगा डॉल्फिन कुछ मिनट के अंतराल पर केवल दो से तीन सेकंड के लिए पानी की सतह पर आती हैं। इसके बाद वे फिर गहरे पानी में चली जाती हैं। इसलिए केवल आंखों से उनकी सटीक गणना करना मुश्किल होता है। गंगा डॉल्फिन की आंखों की रोशनी बेहद सीमित होती है। वे पानी में रास्ता खोजने और आसपास की वस्तुओं का पता लगाने के लिए पराध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करती हैं। इसी विशेषता का लाभ आधुनिक तकनीक से होने वाले सर्वे में लिया जा रहा है।

पहले के आंकड़ों में रहा है अंतर

चंबल में डॉल्फिन की संख्या को लेकर अलग-अलग गणनाओं में अंतर सामने आया है। वर्ष 2022 के पहले सेंसस में 250 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। वहीं, फरवरी 2026 में हुई वार्षिक जलीयजीव गणना में इनकी संख्या 155 बताई गई थी। वर्ष 2025 की गणना में करीब 116 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं, जबकि 2024 में संख्या 100 से कम बताई गई थी। हर चार साल में होने वाले डॉल्फिन सेंसस का उद्देश्य इनकी आबादी का अधिक सटीक आकलन करना है।

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