Rahat Indori Death Anniversary: ‘मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पैशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।’ ये लाइन भारत के सबसे अजीम शायर राहत इंदौरी की हैं। जिन्हें दुनिया सिर्फ उनकी शायरी के लिए जानती है, लेकिन राहत इंदौरी केवल एक शायर नहीं थे। वो कभी दबे-कुचले लोगों की आवाज बने, तो कभी उनके कलम से ऐसे प्रेम गीत निकले जो सालों बाद आज भी अमर हैं।
राहत इंदौरी ने अपनी शायरी से आम लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। उनकी शायरी में मोहब्बत, जिंदगी, रिश्ते, समाज और आम आदमी की परेशानियां साफ दिखाई देती थीं। मंच पर उनका अंदाज इतना प्रभावशाली था कि लोग उन्हें घंटों सुनना पसंद करते थे। आज भी उनकी कई शायरियां सोशल मीडिया पर खूब सुनी और साझा की जाती हैं।
ऑटो चलाने वाले का बेटा बना मशहूर शायर
राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनके पिता रिफअत उल्लाह 1942 में देवास जिले के सोनकच्छ से इंदौर आकर बस गए थे। इंदौर आने के बाद उन्होंने ऑटो चलाने और मिल में काम करने जैसे कई काम किए। उस समय देश और दुनिया आर्थिक परेशानियों से गुजर रही थी। दूसरे विश्वयुद्ध के कारण भारत के उद्योगों और कपड़ा मिलों पर भी बुरा असर पड़ा। कई मिलें बंद हुईं और लोगों की नौकरियां चली गईं। इसी मुश्किल दौर में राहत इंदौरी का बचपन आर्थिक तंगी के बीच बीता।
उनका बचपन का नाम कामिल था, जिसे बाद में बदलकर राहत उल्लाह कर दिया गया। उनका असली नाम राहत कुरैशी था। आगे चलकर अपने शहर इंदौर से गहरे जुड़ाव के कारण उन्होंने अपने नाम के साथ ‘इंदौरी’ जोड़ लिया और वो इस तरह राहत कुरैशी से राहत इंदौरी बन गए।
राहत इंदौरी ने इंदौर के नूतन स्कूल से हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी से एमए की पढ़ाई की। साल 1985 में उन्होंने भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की। इसके बाद वो इंदौर के देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे।
कहा जाता है कि राहत इंदौरी को बचपन से ही कला और साहित्य में रुचि थी। उन्होंने केवल 10 साल की उम्र में साइन-बोर्ड बनाने और चित्रकारी का काम शुरू कर दिया था। उनकी डिजाइन और रंगों की समझ इतनी अच्छी थी कि कुछ ही समय में वे इंदौर के प्रसिद्ध साइन-बोर्ड चित्रकार बन गए। उनके बनाए बोर्डों के लिए लोग लंबे समय तक इंतजार करते थे।
राहत इंदौरी की शायरी की शुरुआत से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है। डॉ. दीपक रुहानी राहत इंदौरी पर लिखी अपनी किताब ‘मुझे सुनाते रहे लोग वाकया मेरा’ में इस किस्से का जिक्र किया है। रुहानी लिखते हैं कि जब राहत इंदौरी नूतन हायर सेकेंडरी स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब उनके स्कूल में एक मुशायरा आयोजित हुआ। राहत की ड्यूटी शायरों के स्वागत में लगाई गई थी। इसी दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जांनिसार अख्तर से हुई। राहत ने उनसे ऑटोग्राफ लेते हुए पूछा कि वे भी शेर पढ़ना चाहते हैं, इसके लिए उन्हें क्या करना चाहिए।
जांनिसार अख्तर ने कहा कि पहले कम से कम पांच हजार शेर याद करो। राहत ने जवाब दिया कि उन्हें तो अभी से इतने शेर याद हैं। इस पर जांनिसार अख्तर ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अब अगला शेर तुम्हारा होगा। उन्होंने एक मिसरा लिखा ‘हमसे भागा न करो दूर गजालों की तरह’। इसके जवाब में राहत ने तुरंत दूसरा मिसरा कहा ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह।’ यह घटना उनके शायर बनने की दिशा में एक खास पड़ाव मानी जाती है।
हॉकी और फुटबॉल में भी थी दिलचस्पी राहत इंदौरी
राहत इंदौरी केवल शायरी और चित्रकारी तक सीमित नहीं थे। उन्हें खेलों का भी बहुत शौक था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शुरुआती दिनों में वे खुद को खिलाड़ी के रूप में देखते थे। वे हॉकी और फुटबॉल खेलते थे और स्कूल-कॉलेज की टीमों की कप्तानी भी कर चुके थे। खेल के मैदान ने उन्हें नेतृत्व, अनुशासन और टीम के साथ काम करना सिखाया। बाद में उनका झुकाव उर्दू साहित्य और शायरी की ओर बढ़ता गया और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।
राहत इंदौरी की खासियत थी कि वे कठिन बातों को भी सरल और प्रभावशाली शब्दों में कह देते थे। उनकी शायरी में प्रेम और जिंदगी की भावनाएं थीं, तो वहीं समाज और व्यवस्था पर सवाल उठाने का साहस भी था। उनकी पंक्ति ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं’ इंटरनेट के दौर में बेहद लोकप्रिय हुई। सोशल मीडिया पर इस पंक्ति को लेकर कई मीम्स और पोस्ट बनाए गए। हालांकि उनकी लोकप्रियता केवल इंटरनेट की वजह से नहीं थी। वे कई दशकों तक देश-विदेश के मुशायरों में अपनी अलग पहचान बना चुके थे।
बुमरो बुमरो को बनाया अमर
राहत इंदौरी ने मंचों पर शायरी के अलावा फिल्में के लिए भी कई प्रसिद्ध गाने लिखे। उनके लिखे चर्चित गानों में इश्क का ‘नींद चुराई मेरी’, करीब का ‘चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं’, मुन्ना भाई एमबीबीएस का ‘छन छन’, मर्डर का ‘दिल को हजार बार रोका’ शामिल हैं। लेकिन उनके लिखे फिल्मों गानों में से अधिक प्रसिद्धि साल 2000 में आई ऋतिक रोशन और संजय दत्त की फिल्म मिशन कश्मीर के गाने बुमरो बुमरो को लेकर मिली। उन्होंने इसमें कश्मीरी संस्कृति के लोकगीत को एक नई पहचान दिलाने का काम किया।
राहत इंदौरी का निधन 11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में हुआ। कोरोना संक्रमण के दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन की खबर से साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
राहत इंदौरी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों की जुबान पर है। इंदौर से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें देश-दुनिया के मंचों तक ले गया। उन्होंने साबित किया कि मुश्किल हालात भी किसी इंसान के सपनों और प्रतिभा को रोक नहीं सकते। यही वजह है कि राहत इंदौरी सिर्फ एक शायर नहीं, बल्कि इंदौर की पहचान और हिंदी-उर्दू साहित्य की दुनिया का एक यादगार नाम बन चुके हैं।