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ग्वालियर के कंपू क्षेत्र की कैंसर पहाड़ी पर स्थित है मांढरे वाली माता मंदिर।
करीब150 साल पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास।
मांढरे वाली माता को सिंधिया राजघराने की कुलदेवी माना जाता है।
ग्वालियर रियासत के शासक जयाजीराव सिंधिया और आनंद राव मांडरे के सहयोग से मंदिर की स्थापना की मान्यता है।
नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।
150 Year Old Temple in Gwalior : एमपी के ग्वालियर में कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं। जिनकी अपनी अलग पहचान और मान्यताएं हैं। इन्हीं में एक प्रमुख मंदिर है कंपू क्षेत्र की कैंसर पहाड़ी पर स्थित मांढरे वाली माता मंदिर। करीब 135 से 150 साल पुराने इस मंदिर में विराजमान मां महाकाली के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। ये मंदिर धार्मिकआस्था के साथ ग्वालियर के इतिहास और सिंधिया राजघराने से जुड़े संबंधों के लिए भी जाना जाता है।
ग्वालियर के कंपू क्षेत्र में स्थित मांढरे वाली माता मंदिर कैंसर पहाड़ी पर बना है। वर्षों से ये मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के दिनों में यहां विशेष रूप से भक्त माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। पूरे वर्ष मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। मंदिर का ऐतिहासिक महत्व इसे ग्वालियर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाता है।
मंदिर का इतिहास करीब 135 से 150 साल पुराना बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, ग्वालियर रियासत के शासक जयाजीराव सिंधिया और आनंद राव मांडरे के सहयोग से मंदिर की स्थापना कराई गई थी। उस समय माता की प्रतिमा को स्थापित कर इस स्थान को धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया। धीरे-धीरे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक आनंद राव मांडरे देवी की प्रतिमा महाराष्ट्र के सतारा से ग्वालियर लेकर आए थे। इसके बाद कैंसर पहाड़ी पर माता की स्थापना की गई। मंदिर में अष्टभुजा महिषासुर मर्दिनी मां महाकाली का दिव्य स्वरूप विराजमान है। माता की आठ भुजाओं वाली प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
मांढरे वाली माता मंदिर की सबसे खास बात इसका नाम है। मान्यता है कि आनंद राव मांडरे की गहरी आस्था और भक्ति के चलते मंदिर उनके नाम से प्रसिद्ध हो गया। ग्वालियर शहर में ये मंदिर देवी के नाम के साथ उनके भक्त की पहचान से भी जुड़ा हुआ है। यही विशेषता इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है।
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार मांढरे वाली माता को सिंधिया राजघराने की कुलदेवी माना जाता है। कहा जाता है कि परिवार के महत्वपूर्ण और शुभ कार्यों से पहले माता के दर्शन और पूजा-अर्चना करने की परंपरा रही है। आज भी मांडरे परिवार की पीढ़ियां मंदिर की सेवा और परंपराओं से जुड़ी हुई हैं।
मांढरे वाली माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि ग्वालियर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है। माता की महिमा, सिंधिया राजघराने से जुड़ी मान्यताएं और आनंद राव मांडरे की भक्ति इस मंदिर को विशेष बनाती हैं। नवरात्रि पर्व के अवसर पर ये मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहता है।