MP MBBS Intern Stipend : राजधानी भोपाल में गांधी मेडिकल कॉलेज के MBBS इंटर्न डॉक्टर स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में 12 से 14 घंटे तक ड्यूटी करने के बावजूद उन्हें देश के कई राज्यों की तुलना में बेहद कम स्टाइपेंड मिल रहा है।
मध्य प्रदेश में MBBS इंटर्न को प्रतिमाह सिर्फ ₹14,337 दिए जाते हैं, जबकि ओडिशा में यही राशि ₹44,319 तक पहुंच जाती है। यानी दोनों राज्यों के बीच हर महीने ₹29,982 का अंतर है। ऐसे में इंटर्न डॉक्टरों का सवाल है कि जब काम और जिम्मेदारी लगभग समान है तो स्टाइपेंड में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
मध्य प्रदेश के ₹14,337 स्टाइपेंड की तुलना पड़ोसी और दूसरे राज्यों से करें तो हर जगह MP से ज्यादा राशि मिल रही है। छत्तीसगढ़ में इंटर्न डॉक्टरों को ₹15,900 यानी मध्य प्रदेश से ₹1,563 ज्यादा मिलते हैं। महाराष्ट्र में ₹18 हजार, राजस्थान में ₹22,400 और उत्तर प्रदेश में ₹25 हजार स्टाइपेंड है। आंध्र प्रदेश में यह राशि ₹25,906 और तेलंगाना में ₹29,192 है। झारखंड में ₹30 हजार और ओडिशा में सबसे ज्यादा ₹44,319 प्रतिमाह स्टाइपेंड मिल रहा है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश और ओडिशा के MBBS इंटर्न स्टाइपेंड में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। ओडिशा में इंटर्न डॉक्टर को ₹44,319 प्रतिमाह मिलते हैं, जबकि मध्य प्रदेश में ₹14,337। यानी MP के इंटर्न डॉक्टर को ओडिशा के मुकाबले हर महीने ₹29,982 कम मिल रहे हैं। सालाना आधार पर देखें तो यह अंतर करीब ₹3.60 लाख तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश के इंटर्न डॉक्टर स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
तेलंगाना में MBBS इंटर्न को ₹29,192 और झारखंड में ₹30 हजार प्रतिमाह मिलते हैं। यानी दोनों राज्यों में मिलने वाला स्टाइपेंड मध्य प्रदेश की मौजूदा राशि के दोगुने से भी ज्यादा है। राजस्थान में ₹22,400 और उत्तर प्रदेश में ₹25 हजार स्टाइपेंड दिया जा रहा है। ऐसे में मध्य प्रदेश के डॉक्टरों का तर्क है कि राज्य में इंटर्न डॉक्टरों से लंबे समय तक ड्यूटी और मरीजों की देखभाल की जिम्मेदारी ली जा रही है, लेकिन उसके अनुपात में आर्थिक मानदेय नहीं दिया जा रहा।
इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि मौजूदा महंगाई में ₹14,337 का स्टाइपेंड शहर में रहने और रोजमर्रा के खर्चों के लिए पर्याप्त नहीं है। हॉस्टल या कमरे का किराया, मेस, किताबें, आने-जाने का खर्च और अन्य बुनियादी जरूरतें पूरी करने में ही बड़ी रकम खर्च हो जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि 12 से 14 घंटे की ड्यूटी के बाद भी इतना कम स्टाइपेंड मिलने से आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और कई इंटर्न को अपने खर्च के लिए परिवार पर निर्भर रहना पड़ता है।
इंटर्न डॉक्टरों के मुताबिक स्टाइपेंड मिलने की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। जिस विभाग में इंटर्न की ड्यूटी चल रही होती है, वहां कार्य पूरा होने के बाद विभागाध्यक्ष की ओर से इंटर्नशिप पूरी होने से संबंधित पत्र दिया जाता है। इसके बाद स्टाइपेंड मिलने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। डॉक्टरों का कहना है कि इस प्रक्रिया के चलते कई बार स्टाइपेंड मिलने तक उन्हें घर से पैसे लेकर अपना खर्च चलाना पड़ता है।
इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि दूसरे राज्यों में समय-समय पर स्टाइपेंड का पुनरीक्षण किया जाता है, जबकि मध्य प्रदेश में लंबे समय से स्टाइपेंड में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई है। उनका कहना है कि महंगाई और मेडिकल शिक्षा से जुड़े खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में स्टाइपेंड की राशि भी समय के साथ बढ़नी चाहिए। डॉक्टरों की मांग है कि मध्य प्रदेश में भी दूसरे राज्यों के अनुरूप स्टाइपेंड का पुनरीक्षण किया जाए।
गांधी मेडिकल कॉलेज के इंटर्न डॉक्टरों की मांग है कि मौजूदा ₹14,337 स्टाइपेंड को बढ़ाकर कम से कम ₹30 हजार किया जाए। उनके मुताबिक, यह केवल पैसे बढ़ाने की मांग नहीं है, बल्कि लंबे समय तक ड्यूटी करने वाले इंटर्न डॉक्टरों की मेहनत और जिम्मेदारी के अनुरूप मानदेय तय करने का सवाल है। अब देखना होगा कि दूसरे राज्यों में मिलने वाले स्टाइपेंड और मध्य प्रदेश के बीच के इस अंतर को देखते हुए सरकार इंटर्न डॉक्टरों की मांग पर क्या फैसला लेती है।