पढ़ाई करते हुए बच्ची (सौ. फ्रीपिक) 
लाइफस्टाइल

परफेक्ट पेरेंटिंग या भारी दबाव! क्यों आज के दौर में प्रेशर कुकर पेरेंटिंग बन गई है बच्चों की सबसे बड़ी दुश्मन?

Pressure Cooker Parenting: आज के समय में कई माता-पिता अपने बच्चों से हर क्षेत्र में परफेक्ट बनने की उम्मीद रखने लगे हैं। जो धीरे धीरे प्रेशर कुकर पेरेंटिंग का रुप ले लेती है।

प्रीति शर्मा

Parenting Mistakes To Avoid: हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में नंबर वन रहे लेकिन परफेक्शन की यह चाहत कब प्रेशर कुकर पेरेंटिंग बन जाती है पता ही नहीं चलता। जब बच्चों पर उम्मीदों का दबाव कुकर की भाप की तरह बढ़ने लगता है तो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर इसके गंभीर परिणाम होते हैं।

प्रेशर कुकर पेरेंटिंग

यह एक ऐसा शब्द है जो उन माता-पिता के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो अपने बच्चों पर सफलता और परफॉरमेंस का अत्यधिक दबाव डालते हैं। जैसे कुकर के अंदर भाप घुटती रहती है वैसे ही इन बच्चों का बचपन उम्मीदों के बोझ तले दब जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दबाव को कम न किया गया तो इसके नतीजे मानसिक और भावनात्मक रूप से खतरनाक हो सकते हैं।

मेंटल स्ट्रेस और एंग्जायटी

जब बच्चे को लगने लगता है कि उसकी अहमियत सिर्फ उसके ग्रेड्स या मार्क्स से है तो वह हमेशा डर में जीने लगता है। यह डर धीरे-धीरे एंग्जायटी और डिप्रेशन का रूप ले लेता है। बच्चा हमेशा इस चिंता में रहता है कि अगर वह विफल हुआ तो उसे माता-पिता का प्यार नहीं मिलेगा।

हारने का खौफ और झूठ का सहारा

प्रेशर कुकर वाले माहौल में गलती करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। डांट और सजा से बचने के लिए बच्चे अक्सर अपने मार्क्स छिपाने या झूठ बोलने लगते हैं। वे नई चीजों को ट्राई करने से भी कतराते हैं क्योंकि उनमें हारने का डर घर कर जाता है।

क्रिएटिविटी का दम घुट जाना

जब माता-पिता हर चीज में केवल परफेक्शन मांगते हैं तो बच्चे की स्वाभाविक रचनात्मकता खत्म हो जाती है। वे रोबोट की तरह निर्देशों का पालन तो करते हैं लेकिन अपनी मौलिक सोच और कल्पना शक्ति खो देते हैं।

रिश्तों में बढ़ती दूरियां

जब घर का माहौल हमेशा किसी एग्जाम हॉल जैसा बना रहता है तो माता-पिता और बच्चों के बीच का भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो जाता है। बच्चा अपने माता-पिता को दोस्त या मार्गदर्शक मानने के बजाय एक सख्त बॉस की तरह देखने लगता है।

कम उम्र में मानसिक बर्नआउट

पढ़ाई, ट्यूशन और एक्स्ट्रा क्लासेस के अंतहीन सिलसिले से बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से जल्दी थक जाते हैं। इसे बर्नआउट कहा जाता है। ऐसे बच्चे जवानी तक पहुंचते-पहुंचते अपनी पढ़ाई या करियर से नफरत करने लगते हैं क्योंकि उन्होंने अपना बचपन कभी खुलकर जिया ही नहीं।

बच्चे कच्चे घड़े की तरह होते हैं जिन्हें आकार देने के लिए प्रेम और सहयोग के सहारे की जरूरत होती है न कि भारी दबाव की। एक सफल बच्चा होने से ज्यादा जरूरी है एक मानसिक रूप से स्वस्थ और खुश बच्चा होना।

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