International Moon Day 2026: हर साल 20 जुलाई को इंटरनेशनल मून डे मनाया जाता है। यह दिन उस ऐतिहासिक पल की याद दिलाता है, जब 20 जुलाई 1969 को पहली बार चांद की जमीन पर किसी इंसान ने अपना पहला कदम रखा था।
संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को सम्मान देने और अंतरिक्ष के रहस्यों की खोज को बढ़ावा देने के लिए इस दिन को इंटरनेशनल मून डे के रूप में मान्यता दी है। दूर से दिखने वाला चांद हमेशा से इंसानों के लिए कौतूहल से भरा हुआ रहा है। कभी चांद पर कविता-कहानियां सेबनी, तो कभी फिल्म और गाने और कभी वैज्ञानिकों ने भी चांद को जानने की कोशिश की। पिछले कुछ दशकों में कई देशों ने चंद्रमा तक अपने मिशन भेजे और अंतरिक्ष विज्ञान को नई दिशा दी।
20 जुलाई 1969 को अमेरिका के Apollo 11 मिशन ने इतिहास रचा था। इस मिशन के तहत नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन चांद की सतह पर उतरने वाले पहले इंसान बने, जबकि माइकल कॉलिन्स चंद्रमा की कक्षा में कमांड मॉड्यूल में मौजूद रहे। नील आर्मस्ट्रांग का पहला कदम पूरी दुनिया के लिए एक यादगार पल बन गया।
अपोलो मिशन के बाद भी दुनिया के कई देशों ने चंद्रमा की खोज जारी रखी। सोवियत संघ, चीन, भारत, जापान और यूरोप समेत कई देशों ने अलग-अलग मिशन के जरिए चांद की सतह और वहां पानी व खनिज की मौजूदगी की संभावनाओं की तलाश कर रही है।
भारत ने भी चंद्रयान मिशन के जरिए अपनी मजबूत पहचान बनाई है और भविष्य में भी कई नए मिशन की तैयारी जारी है।
इस साल 20 जुलाई को इंटरनेशनल मून डे के दिन आसमान में Waxing Crescent यानी बढ़ता हुआ अर्धचंद्र दिखाई देगा। इस दौरान चंद्रमा का लगभग 39 प्रतिशत हिस्सा सूर्य की रोशनी से प्रकाशमान रहेगा। यह चरण अमावस्या के बाद आता है और पूर्णिमा की ओर बढ़ते चंद्रमा का हिस्सा होता है।
यह दिन सिर्फ अपोलो 11 की सफलता का जश्न मनाने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए भी मनाया जाता है। मून डे यह संदेश देने के लिए भी मनाया जाता है कि अंतरिक्ष की खोज पूरी मानवता के हित में शांतिपूर्ण तरीके से होनी चाहिए।
चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर लगभग 29.5 दिनों में एक पूरा चक्कर लगाता है और इस दौरान वह आठ अलग-अलग चरणों में दिखता है।
इस चरण में चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच होता है। इसलिए चंद्रमा का जो हिस्सा पृथ्वी की ओर होता है, वह पूरी तरह अंधेरे में रहता है और हमें दिखाई नहीं देता।
चंद्रमा के दाईं ओर यानी उत्तरी गोलार्ध में रोशनी की एक पतली-सी धार दिखाई देने लगती है।
चंद्रमा का दायां आधा हिस्सा रोशनी से चमकता है, जिससे वह आधे चंद्रमा जैसा दिखाई देता है।
इस अवस्था में चंद्रमा का आधे से अधिक हिस्सा प्रकाशित होता है, लेकिन वह पूरी तरह से पूर्णिमा नहीं बना होता।
इस चरण में चंद्रमा का पूरा चेहरा सूर्य की रोशनी से जगमगा उठता है और वह पूरी तरह दिखाई देता है।
पूर्णिमा के बाद चंद्रमा की रोशनी कम होने लगती है। उत्तरी गोलार्ध में सबसे पहले दाईं ओर का हिस्सा अंधेरा होने लगता है।
इस अवस्था में चंद्रमा फिर से आधा दिखाई देता है, लेकिन अब उसका बायां हिस्सा प्रकाशित रहता है।
इस अंतिम चरण में चंद्रमा के बाईं ओर केवल एक पतली रोशनी की धार बचती है। इसके बाद वह फिर से अमावस्या की अवस्था में पहुंच जाता है और पूरा चक्र दोबारा शुरू होता है।