नवभारत डेस्क : कार्तिक महीने की अमावस्या को दिपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार को हिन्दू त्योहारों का महापर्व भी माना जाता है। सिर्फ देश ही नहीं विदेश में भी इस त्योहार को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। दिपावली के इस त्योहार को काफी उल्हास और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
दिपोत्सव के रुप में मनाने वाले इस त्योहार को जहां पूरा देश खुशी से मनाता है, वहीं हमारे देश का एक क्षेत्र ऐसा भी है, जहां ये त्योहार की कोई खुशी नहीं मनायी जाती है। आखिर इसके पीछे का क्या कारण है, आज इस खबर में जानते हैं। भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में रहने वाले अयंगर हिन्दू आज भी दिपावली का पर्व नहीं मनाते हैं? आइएं जानते है
कर्नाटक के मेलकोट में रहनेवाला मांड्यम अयंगर समाज आज भी दिपावली के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाते है। तकरीबन 2 शताब्दी पहले मैसूर के शेर के रूप में जानेवाले क्रूर अक्रांता टीपू सुल्तान ने मेलकोट में रहनेवाले ८०० लोगों को जिंदा जलवा दिया था,जिसके बाद से आज तक मेलकोट में रहने वाले मांड्यम अयंगर हिन्दू दीपावली नहीं मनाते है। इस घटना को आज भी इस इलाके के लोग भूल नहीं पाए है, इसीलिए आज भी यहां दिपावली का त्योहार नहीं मनाया जाता है।
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मेलकोट कर्नाटक के मांड्या जिले का एक छोटा सा गाँव है। मांड्यम अयंगर हिन्दू का प्रतिनिधित्व करनेवाली रानी लक्ष्मीमणि ने ब्रिटिशों के साथ सैन्य गणबंधन के लिए अपने प्रयासों को शुरू कर दिया था। इसकी खबर जैसे ही क्रूर टीपू सुल्तान को हुई उसने इसे देशद्रोह के रूप में देखा और इसकी प्रतिक्रिया के रूप में उसने संपूर्ण मांड्यम अयंगर समुदाय के विनाश का निर्णय ले लिया और मांड्यम अयंगर समुदाय के ८०० लोगों को जिंदा जलवा दिया। इस क्रूरता के बाद से इस गांव के हिन्दू परिवार इस दिन खुशी की जगह मातम के रुप में मनाते हैं। इस रोशनी के पर्व के दिन भी इस गांव में अंधेरा छाया रहता है।