यूपी विधानसभा( फोटो- सोशल मीडिया) 
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यूपी विधान परिषद में नेताओं व अधिकारियों के रिश्तेदारों को मिली नौकरी, हाईकोर्ट ने बताया चौंकाने वाला घोटाला!

उत्तर प्रदेश का सरकार का एक घोटाला सामने आया है। एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधान परिषद में 186 पदों पर हुई भर्ती में बड़ा खेल हो गया है।

Saurabh Pal

लखनऊः उपचुनाव के बीच उत्तर प्रदेश का सरकार का एक घोटाला सामने आया है। एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधान परिषद में 186 पदों पर हुई भर्ती में बड़ा खेल हो गया है। इस परीक्षा में हर पांचवां उम्मीदवार किसी नेत या किसी अधिकारी का रिश्तेदार निकला है। खास बात है कि जिन अधिकारियों के रिश्तेदारों की भर्ती हुई है, उन्हीं में से कई अधिकारी इस परीक्षा की निगरानी कर रहे थे।

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बे सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह तो ‘चौंकाने वाला घोटाला है’। साथ ही कहा कि कोर्ट ने अधिकारियों के भाई भतीजावाद वाली निष्ठा पर भी सवाल खड़े किए हैं।

186 पदों पर निकली थी वैकेंसी

दरअसल यह खुलासा इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट से हुआ है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में 186 पदों पर भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी। इस भर्ती के लिए 2.50 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। रिपोर्ट के मुताबिक जिन्हें नियुक्ति दी गई, उनमें तत्कालीन उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के जनसंपर्क अधिकारी और उनके भाई, एक मंत्री का भतीजा, विधान परिषद सचिवालय प्रभारी का बेटा, विधानसभा सचिवालय प्रभारी के चार रिश्तेदार, संसदीय कार्य विभाग प्रभारी के बेटा और बेटी, एक उप लोकायुक्त का बेटा और दो मुख्यमंत्रियों के पूर्व स्पेशल ड्यूटी अधिकारी के बेटे शामिल हैं। इतना ही नहीं सफल अभ्यर्थियों के लिस्ट में दो प्राइवेट फर्म TSR डाटा प्रोसेसिंग और राभव के मालिकों के रिश्तेदार भी शामिल हैं।

असफल अभ्यर्थियों की याचिका से हुआ खुलासा

विधान परिषद की नौकरियों पर खुलासा तब हुआ जब 2021 के तीन असफल अभ्यर्थियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। इस मामले से जुड़ी कई अन्य याचिकाएं भी दाखिल हुईं। 18 सितंबर 2023 को हाईकोर्ट ने दो याचिकाओं को जोड़ते हुए इन याचिकाओं को जनहित याचिका में बदल दिया और फिर दो जजों की बेंच को सुनवाई के लिए भेज दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट भी मामले को देखकर अचंभित रह गया। हाईकोर्ट ने इसे चौंकाने वाला घोटाला करार देते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी। जिसके खिलाफ यूपी विधान परिषद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच पर रोक लगा दी। अब इस मामले की सुनवाई 6 जनवरी 2025 को होगी।

नियमों में किया गया संशोधन

गौरतलब है कि वर्ष 2026 तक सचिवालय में भर्ती उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से की जाती थी, लेकिन इसी साल नियमों में बदलाव कर दिया गया। जिसके बाद 2019 विधान परिषद ने खुद भर्ती परीक्षा आयोजित करवाने का फैसला लिया। हाईकोर्ट ने इस पर भी हैरानी जताई है।

नेताओं के करीबियों को भी मिली नौकरी

बता दें कि इस भर्ती में राजनेताओं के करीबियों को भी तरजीह दी गई। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री करीबी जैनेंद्र सिंह यादव उर्फ नीटू के भतीजे की विधानसभा में RO के पद पर नियुक्ति हुई है। इसके अलावा विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित के पीआरओ की नियुक्ति विधान परिषद के प्रकाशन विभाग में हुई। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस के सवाल पर हृदयनारायण दीक्षित ने कहा  कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

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