PM Modi Three Nation Tour Outcomes: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 से 12 जुलाई के बीच इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की 144 घंटे की विदेश यात्रा की। यह दौरा भारत के लिए रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान कई ऐसे समझौते हुए जो आने वाले सालों में भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी भूमिका को मजबूत कर सकते हैं। आइए आपको बतातें है कि पीएम मोदी की इस मैराथन यात्रा से भारत को किनता और क्या फायदा होगा। साथ ही ये भी कि समझौते के दौरान भारत ने कौन-कौन से समझौते किए और इसके क्या फायदे और नुकसान हो सकते हैं?
प्रधानमंत्री मोदी अपने विदेश दौरे पर पहले पड़ाव इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंचे थे। यहां भारत और इंडोनेशिया के बीच कुल 14 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें रक्षा, समुद्री सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और डिजिटल सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल रहे। दोनों देशों ने सुमात्रा के उत्तर में स्थित सबांग पोर्ट को मिलकर विकसित करने पर सहमति जताई। यह गहरे पानी का बंदरगाह है, जहां बड़े युद्धपोत और पनडुब्बियां भी आ सकती हैं। सबांग पोर्ट मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब स्थित है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है और चीन के तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगी।
भारत और इंडोनेशिया के बीच लगभग 63 करोड़ डॉलर की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीद का समझौता भी हुआ। इसके साथ ही एस्ट्रा Mk-1 एयर-टू-एयर मिसाइल को लेकर भी सहमति बनी। इस समझौते के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला तीसरा देश बन गया। इससे भारत के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और दक्षिण-पूर्व एशिया में सुरक्षा सहयोग भी मजबूत होगा। दोनों देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स, स्टील उद्योग और यूपीआई (UPI) को जोड़ने पर भी सहमति जताई। इसके अलावा इंडोनेशिया में आईआईएम बेंगलुरु का कैंपस खोलने का फैसला भी लिया गया, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे।
पीएम मोदी इंडोनेशिया के बाद दूसरे चरण में ऑस्ट्रेलिया पहुंचे, जहां उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ तीसरी वार्षिक शिखर बैठक की। इस दौरान ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर कई अहम समझौते हुए।
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम आपूर्ति संबंधी एक प्रशासनिक व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए। ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के लगभग 28 प्रतिशत यूरेनियम भंडार हैं। भारत 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। ऐसे में यह समझौता देश की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और कोयले पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा।
भारत इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी निर्माण के लिए जरूरी लीथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों का अधिकांश आयात करता है। इनमें चीन का बड़ा दबदबा है। ऑस्ट्रेलिया के साथ हुई नई साझेदारी के बाद भारत को इन खनिजों की सीधी आपूर्ति और उनके प्रसंस्करण (रिफाइनिंग) में सहयोग मिलेगा। इससे भारत के ईवी और बैटरी उद्योग को मजबूती मिलेगी और चीन पर निर्भरता कम होगी।
दोनों देशों ने रक्षा नवाचार (डिफेंस इनोवेशन) को बढ़ावा देने के लिए एक नया सहयोग ढांचा बनाने पर सहमति जताई। इसके अलावा हिंद महासागर में स्थित कोकोस कीलिंग द्वीप समूह पर स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल स्थापित करने का भी निर्णय लिया गया। यह केंद्र भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन की ट्रैकिंग और निगरानी में मदद करेगा।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का अंतिम पड़ाव न्यूजीलैंड था। यह पिछले चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली न्यूजीलैंड यात्रा रही, इसलिए इसे दोनों देशों के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। भारत और न्यूजीलैंड ने 2030 तक दोनों देशों के व्यापार को लगभग दोगुना कर 35 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। दोनों देशों ने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को आगे बढ़ाते हुए इसे व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप देने पर भी सहमति जताई। इससे कीवी फल, लकड़ी और अन्य उत्पादों पर शुल्क कम होने की संभावना है, जिससे व्यापार बढ़ेगा।
न्यूजीलैंड ने अगले 15 सालों में भारत में 20 अरब डॉलर यानी करीब 1.72 लाख करोड़ रुपये निवेश करने की घोषणा की है। इसके अलावा नागालैंड और उत्तराखंड में कृषि उत्कृष्टता केंद्र (एग्रीकल्चर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) स्थापित किए जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से आधुनिक कृषि तकनीक और बेहतर खेती के तरीकों को बढ़ावा मिलेगा।दोनों देशों ने अपनी नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने और लॉजिस्टिक सहायता को मजबूत करने पर भी सहमति जताई। दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए यह सहयोग भारत की समुद्री रणनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की यह 144 घंटे की विदेश यात्रा केवल तीन देशों के दौरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने भारत की 'एक्ट ईस्ट' और 'इंडो-पैसिफिक' नीति को नई मजबूती दी। इंडोनेशिया के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग बढ़ा, ऑस्ट्रेलिया ने भारत की ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरतों को सुरक्षित करने की दिशा में अहम कदम उठाया, जबकि न्यूजीलैंड के साथ व्यापार, निवेश और समुद्री सुरक्षा के नए अवसर खुले।
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इन समझौतों का असर आने वाले सालों में भारत की रक्षा क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और वैश्विक रणनीतिक स्थिति पर देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि इस 144 घंटे की यात्रा को भारत की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।