CJP Protest Impact on Politics: भारत के मुख्य न्यायाधिश सूर्यकांत की एक टिप्पणी से शुरू हुई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) बड़े आंदोलन के उभर कर सामने आई है। देश में होने वाले चुनावों और राजनीति पर इस आंदोलन का क्या असर होगा, फिलहाल इसका आकलन जल्दबाजी होगी। लेकिन जेन-जी ने सरकार को डिफेंस मोड में लाकर खड़ा कर दिया है। इसके साथ ही इस आंदोलन ने विपक्षी दलों के भीतर रेगिस्तान में बारिश की तरह काम किया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र के खिलाफ सड़कों पर उतर गए और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक अडिग रहे।
संसद के मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक लाने की तैयारी में जुटी सरकार अब अपनी योजना पर पुनर्विचार कर रही है। जबकि ऐसा माना जा रहा था कि एनडीए संसद में इसे पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच चुकी है। डीएमके और एनसीपी (शरद पवार) भी विधेयक का समर्थन करने के विकल्प खुले रखे हुए प्रतीत हो रहे थे। लेकिन अब उनका रुख पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित दिखाई दे रहा है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में मिली बड़ी जीत के बाद और कई क्षेत्रीय पार्टियों में टूट के कारण भाजपा के ताकत में इजाफा हुआ था। हालांकि, अब सीजेपी आंदोलन के बाद उसमें बदलाव देखने को मिल रहा है। सोमवार को मीडिया में आई खबर के मुताबिक, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के डायरेक्टर ने अपनी इंटरनल रिपोर्ट में इस बात को माना कि 20 जुलाई को सीजेपी के प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और हिंसा हुई थी, इसके अलावा जरूरत से ज्यादा बल का प्रयोग हुआ, जो पुलिस के एक्शन में कई कमियों को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी टिप्पणी में कहा कि प्रदर्शन से निपटने के लिए किसी पर लाठीचार्ज को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
छात्रों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता ने इस मामले को देश के हर एक मिडिल क्लास परिवार तक पहुंचा दिया। शहरों में रहने वाले मिडिल क्लास परिवार को हमेशा से ही बीजेपी के पारंपरिक समर्थक के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि, परीक्षा एवं एजुकेशन सिस्टम में रिफॉर्म की मांग को लेकर वे भी भाजपा के खिलाफ नजर आए।अचानक मिडिल क्लास अभिभावक अपनी जेन-जी संतानों के समर्थन में खड़े हो गए। उन्हें एहसास होने लगा कि उनके बच्चों ने उम्मीद से अधिक साहस, संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया है। भारत जैसे देश में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए भी शिक्षा गरीबी से बाहर निकलने का मुख्य रास्ते के तौर पर देखा जाता है।
2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी सिर्फ 240 सीटों पर सिमट गई। हालांकि, इसकी वजह यूपी में पार्टी की आंतरिक कलह और संघ का चुनावों में सक्रिय प्रचार नहीं करना बताया गया था। लेकिन, अब पार्टी के सामने धारणा की लड़ाई है। अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भाजपा, कॉकरोच जनता पार्टी से किए वादों को कितनी ईमानदारी से पूरा करती है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि क्या वह देश की शिक्षा-व्यवस्था में प्रभावी सुधार लागू करती है।
भाजपा परिस्थितियों के अनुसार जल्दी रणनीति बदलने वाली पार्टी है। प्रधानमंत्री ने नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में विशेष टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की है। साथ ही, नीट में धांधली करने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान करने वाला कानून इसी सप्ताह लाने की योजना भी बनाई जा रही है।
एक महीने के छात्र आंदोलन के बाद भाजपा अब जेन-जी को हर संभव साधने की कोशिश कर रही है। सरकार ने सीजेपी की सभी मांगों को स्वीकार कर लिया है। हालांकि, यह भी सच है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक वर्ग नाराज है। इससे पार्टी के मीडिल क्लास सपोर्टर के आधार में भी एक असंतोष की स्थिति बन गई है, जो भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
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कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए इस छात्र आंदोलन का सबसे अधिक लाभ कांग्रेस को मिला है। पार्टी ने भी वक्त की नजाकत को समझते हुए समय-समय पर सही कदम उठाए। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक से राहुल गांधी मुलाकात करने नहीं गए। इससे आंदोलन को किसी एक पार्टी के होने का आरोप नहीं लगा। हालांकि, जब छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, तब राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं के साथ प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। वहीं, कांग्रेस ने प्रधान के इस्तीफे का श्रेय लेने की कोशिश भी नहीं की।