पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (सोर्स- सोशल मीडिया)
देश

राष्ट्रपति बनकर भी नहीं भूले वैज्ञानिक सोच, डॉ. कलाम के फैसलों से हिल गई थी सियासत, वाजपेयी भी रह गए थे हैरान

APJ Abdul Kalam: डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति रहते हुए कई महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसले लिए। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल लौटाने से लेकर लोकसभा भंग करने की सिफारिश पर विचार तक, उनकी भूमिका चर्चा में रही।

अक्षय साहू

Highlights:

  • डॉ. कलाम 2002 में भारत के 11वें राष्ट्रपति बने थे।

  • डॉ. कलाम ने ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ पुनर्विचार के लिए संसद लौटाया।

  • 1998 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का मंत्री पद ठुकराया।

APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: भारत रत्न से सम्मानित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया एक महान वैज्ञानिक के रूप में पहचानती है। उन्हें ‘मिसाइल मैन’ के नाम से भी जाना जाता है। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने की दिशा में उनके नेतृत्व और वैज्ञानिक योगदान की अहम भूमिका रही। हालांकि, उनकी दूरदर्शिता का एक ऐसा पहलू भी है, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने सरकारों को भी अपने निर्णयों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया।

15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 25 जुलाई 2002 को देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। उनकी कोई राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि नहीं थी, फिर भी उन्होंने संवैधानिक प्रमुख के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाया। उनके कार्यकाल ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक स्वीकृति देने तक सीमित नहीं है। कलाम ने अपनी स्वतंत्र सोच और संवैधानिक समझ के जरिए राष्ट्रपति भवन की स्थापित परंपराओं को एक नया दृष्टिकोण दिया और यह दिखाया कि राष्ट्रपति भी महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में स्वतंत्र भूमिका निभा सकते हैं।

वैज्ञानिकों के साथ चर्चा करते डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ पर लिया अहम फैसला

डॉ. कलाम की इसी सोच का एक उल्लेखनीय उदाहरण ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ को संसद में पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का फैसला था। संविधान का अनुच्छेद 111 संसद से पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की सहमति से संबंधित है। कलाम ने इस प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों की अहमियत को सामने रखा।

पूर्व डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

43 सांसदों और 200 विधायकों की सदस्यता पर मंडराया खतरा

साल 2006 में कई राजनीतिक दलों के 43 सांसदों की सदस्यता पर अयोग्यता का खतरा मंडरा रहा था। इसके अलावा, राज्य विधानसभाओं के लगभग 200 सदस्यों के सामने भी ऐसी ही स्थिति थी। इन परिस्थितियों में सभी दलों की ओर से तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज पर दबाव था कि वे जल्द से जल्द संबंधित विधेयक तैयार करें।

बच्चों के साथ डॉ. कलाम

राष्ट्रपति के पास कई याचिकाएं पहुंची थीं, जिनमें सत्ताधारी राजनीतिक वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी। इन सदस्यों में वाम मोर्चे के 11 सांसद भी शामिल थे। डॉ. कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत ऐसे मामलों को चुनाव आयोग के पास भेजने में विशेष रुचि दिखाई थी। इस घटनाक्रम का उल्लेख विभिन्न लेखों में भी मिलता है।

संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा के बाद विधेयक लौटाया

इसके बाद एचआर भारद्वाज ने ‘अयोग्यता निवारण अधिनियम, 1959’ में संशोधन से जुड़ा विधेयक तैयार किया। संशोधित विधेयक को संसद के पिछले सत्र में पारित कर दिया गया। 25 मई को यह विधेयक राष्ट्रपति कलाम के पास पहुंचा। हालांकि, संवैधानिक विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करने के बाद उन्होंने इस पर अपनी मंजूरी देने के बजाय इसे पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेजने का फैसला किया।

राष्ट्रपति के इस कदम को उनकी संवैधानिक शक्तियों के स्वतंत्र इस्तेमाल के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में देखा गया। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि डॉ. कलाम विधेयकों को केवल औपचारिक प्रक्रिया के तहत मंजूरी देने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि वे उनके संवैधानिक महत्व पर भी गंभीरता से विचार करते थे।

जब अटल बिहारी वाजपेयी के प्रस्ताव को कलाम ने ठुकराया

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच गहरे सम्मान और विश्वास का संबंध था। इसके बावजूद, दोनों के बीच ऐसे कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग भी रहे, जब कलाम ने वाजपेयी के प्रस्तावों या सिफारिशों पर तुरंत सहमति नहीं जताई।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

1998 में एनडीए सरकार के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि डॉ. कलाम को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। हालांकि, कलाम ने मंत्री बनने के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसके लगभग चार साल बाद, वर्ष 2002 में, वे देश के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ में इस घटनाक्रम का उल्लेख किया है।

लोकसभा भंग करने की सिफारिश पर भी तुरंत नहीं लिया फैसला

डॉ. कलाम के राष्ट्रपति कार्यकाल का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग फरवरी 2004 का है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने से करीब छह महीने पहले ही सदन को भंग करने की सिफारिश की थी।

आमतौर पर यह माना जाता है कि ऐसी सिफारिश पर राष्ट्रपति की भूमिका औपचारिक होती है, लेकिन डॉ. कलाम ने इस मामले में तुरंत निर्णय नहीं लिया। उन्होंने सिफारिश के संवैधानिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया और तत्कालीन अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी से सलाह ली।

सोली सोराबजी से सलाह लेकर समझे संवैधानिक पहलू

बताया जाता है कि निर्णय लेने से पहले उन्होंने संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन भी किया। इनमें राष्ट्रपति की शक्तियों और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी शामिल थे, जिन्हें सोली सोराबजी ने उन्हें भेजा था।

इस घटनाक्रम से यह सामने आया कि डॉ. कलाम राष्ट्रपति पद से जुड़े अधिकारों और दायित्वों को केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं मानते थे। वे किसी भी महत्वपूर्ण फैसले से पहले उसके कानूनी और संवैधानिक पक्षों को समझना जरूरी मानते थे।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और डॉ. कलाम

राष्ट्रपति के रूप में भी कायम रही वैज्ञानिक सोच

वैज्ञानिक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए भी तर्क, अध्ययन और दूरदर्शिता को प्राथमिकता दी। उनके फैसलों ने यह संदेश दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति की भूमिका केवल परंपराओं का पालन करना नहीं, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप जिम्मेदारी निभाना भी है। यही कारण है कि उनका राष्ट्रपति कार्यकाल आज भी भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक मर्यादाओं के संदर्भ में याद किया जाता है। 

IMD Weather Alert: 22 राज्यों में भारी बारिश-आंधी का अलर्ट, कश्मीर में सीजन की पहली बर्फबारी

Delhi Protest: राहुल गांधी की याचिका पर कल SC में सुनवाई, दिपके का 16 अक्टूबर को CP जाने का ऐलान

OBC आयोग की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना हो पंचायत चुनाव, हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार के पास क्या विकल्प?

इंडिया गेट पहुंचे राहुल गांधी, धरने पर बैठे अंकिता भंडारी के परिवार से कर रहे मुलाकात

अभिजीत दिपके का बड़ा ऐलान, 16 अक्टूबर को दिल्ली में फिर जुटेंगे कॉकरोच; CP में फहराएंगे तिरंगा