पुण्यतिथि विशेष: सुमित्रानंदन पंत ने इस डर से बदला था अपना नाम, जानें गोसांई दत्त की अनसुनी कहानी 
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पुण्यतिथि विशेष: सुमित्रानंदन पंत ने इस डर से बदला था अपना नाम, जानें गोसांई दत्त की अनसुनी कहानी

Death Anniversary Sumitranandan: सुमित्रानंदन पंत का जीवन संघर्ष और स्वाभिमान से भरा हुआ था। उन्होंने कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया, लेकिन उन्होंने अभावपूर्ण जीवन का सामना किया, इस परिस्थिति से वे डरते थे।

अर्पित शुक्ला

नवभारत डेस्क: हृदयस्पर्शी लेखन, बेलौस शैली और निर्भीक व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान कवियों में से एक थे। प्रकृति के अत्यधिक सुकुमार चित्रण के लिए उनका नाम लिया जाता है। सुमित्रानंदन पंत का जीवन संघर्ष और स्वाभिमान से भरा हुआ था। उन्होंने कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया, लेकिन यद्यपि उन्होंने अभावपूर्ण जीवन का सामना किया, इस परिस्थिति से वे भयभीत रहते थे। इस संबंध में उन्होंने 1974 में आकाशवाणी के 'बाल संघ कार्यक्रम' में अपने साक्षात्कार के दौरान खुलासा किया था कि उन्होंने अपना नाम गोसांई दत्त पंत से बदलकर सुमित्रानंदन पंत क्यों रखा।

सुमित्रानंदन पंत ने बताया कि वे नहीं चाहते थे कि उनका जीवन भी गोस्वामी तुलसीदास जैसा हो, जिनका जीवन अभावों में बीता था। पंत ने कहा, "गोसांई में मुझे तुलसीदास जी की छवि दिखाई देती थी। वे महान विद्वान थे, लेकिन उनका जीवन दुखों और अभावों से भरा हुआ था। कहीं ऐसा न हो कि मेरा नाम भी तुलसीदास के समान अभावों का कारण बने, इसलिए मैंने अपना नाम बदल लिया।"

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की पढ़ाई

20 मई 1900 को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कौसानी गाँव में जन्मे सुमित्रानंदन पंत, गंगादत्त और सरस्वती के आठवें संतान थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज में हुई थी, जहां वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए की पढ़ाई करने के लिए आए थे। यहीं 1919 से 1921 तक वे हिंदू छात्रावास में रहे। 1926 में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध काव्य कृति 'पल्लव' लिखी, जिसने छायावाद को नई दिशा दी। इसके बाद उन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। अनुपम परिहार के अनुसार, सुमित्रानंदन पंत ज्योतिष में भी रुचि रखते थे और वे अपनी मृत्यु की तिथि का पूर्वानुमान करने में सक्षम थे। सुमित्रानंदन पंत का जीवन और कार्य साहित्यिक दृषटिकोन से बहुत ही प्रेरणादायक था। समालोचक रविनंदन सिंह के अनुसार, वे हिंदुस्तानी एकेडेमी के उपाध्यक्ष भी रहे। 1930 से 1940 तक वे कालाकांकर के राजा अवधेश सिंह के छोटे भाई सुरेश सिंह के साथ रहे, जहां उन्होंने 'रूपाग' पत्रिका का प्रकाशन किया। वहीं, पंत ने 'गुंजन', 'ज्योत्सना', 'युगांत', 'युग वाणी' जैसी काव्यकृतियाँ लिखी।

2 साल आश्रम में गुजारे

1941 में वे फिर से प्रयागराज लौट आए और बेली रोड स्थित एक भवन में हरिवंश राय बच्चन के साथ रहने लगे। इस भवन को 'बासुधा' (बच्चन-सुमित्रानंद धाम) कहा जाता था। इसके बाद, 1943 में वे नृत्य सम्राट उदयशंकर के साथ भ्रमण पर निकले, जहां उन्होंने उनके नाट्य प्रस्तुतियों के लिए कविताएं लिखीं। 1945 में सुमित्रानंदन पंत पुदुच्चेरी (पूर्व में पांडिचेरी) स्थित अरविंद आश्रम पहुंचे, जहां उन्होंने दो साल बिताए और अरविंद दर्शन पर आधारित 'स्वर्ण किरण' और 'स्वर्ण धुलि' नामक पुस्तकें लिखीं। 1947 में वे मुंबई गए, जहां उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों का भावानुवाद 'मधु ज्वाल' के नाम से किया। 1950 में उन्हें दिल्ली में आकाशवाणी में हिंदी नियोजक का पद मिला, और वहां उन्होंने कई काव्य रचनाएँ कीं। इनमें 'रजत शिखर', 'शिल्पी', 'सौवर्ण गद्य संग्रह' और 'अंतिमा' प्रमुख हैं। इसके बाद, 1957 में उन्होंने आकाशवाणी में सलाहकार के रूप में कार्य किया।

1977 में सुमित्रानंदन पंत ने अपने जीवन की अंतिम यात्रा 28 दिसंबर को प्रयागराज में की, जहां उन्होंने 'वाणी व कला' और 'बूढ़ा चांद' जैसी महत्वपूर्ण काव्य रचनाओं को प्रकाशित किया था।

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