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ओम बिरला ने कहा कि CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नया प्रस्ताव आने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई होगी।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए संविधान और कानून में विशेष प्रक्रिया निर्धारित है।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और संभावित संसदीय बैठक को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है।
Om Birla Statement On Gyanesh Kumar: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग के बीच संसद में इस मुद्दे पर फिर हलचल तेज होने के संकेत मिले हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को कहा कि यदि ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया प्रस्ताव लाया जाता है, तो उस पर निर्धारित नियमों और संसदीय प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज करा रहा है और उन्हें पद से हटाने की मांग को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात कर चुका है। हालांकि, बिरला के बयान का मतलब यह नहीं है कि किसी नए प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद में प्रस्ताव आने के बाद ही नियमानुसार कदम उठाए जाएंगे।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ संभावित प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में एक निर्धारित प्रक्रिया होती है और उसी के अनुसार कार्रवाई की जाती है।
बिरला ने कहा, "जब लाएंगे, तब प्रक्रिया अपनाएंगे। उसकी एक प्रक्रिया है। जिस तरीके से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया होती है, वैसे ही चुनाव आयोग के मामले में भी प्रक्रिया होती है।"
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सभी को अपना मत और विचार रखने का अधिकार है। संसद में जब इस संबंध में प्रस्ताव लाया जाएगा, तब नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उनके बयान से साफ है कि फिलहाल आगे की प्रक्रिया किसी नए प्रस्ताव के पेश होने पर निर्भर करेगी।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग पहले भी संसद में उठ चुकी है। विपक्ष की ओर से लोकसभा और राज्यसभा में इस संबंध में नोटिस दिए गए थे। हालांकि, इन नोटिसों को लेकर आगे की संसदीय प्रक्रिया नहीं बढ़ सकी।
विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल हैं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने के लिए केवल राजनीतिक विरोध पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए कानून में निर्धारित आधार और प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सामान्य सरकारी नियुक्तियों से अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर ही पद से हटाया जा सकता है।
इसके लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है। हटाने की प्रक्रिया में कानून के तहत तय आधार और संसदीय शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसलिए किसी प्रस्ताव का पेश होना और उसका स्वीकार होना अपने आप में पद से हटाए जाने के बराबर नहीं है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे की प्रक्रिया भी अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित होती है। ऐसे मामलों में संबंधित कानूनी नियमों को ध्यान में रखना जरूरी है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद उस समय और तेज हुआ, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ मौकों पर फैसलों को लेकर असहमति जताई थी।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि निर्णय अधिकारियों की सहमति से लिए गए थे। इस तरह आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर सामने आए दावों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच विवाद बना हुआ है। इन घटनाक्रमों के बाद विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए।
ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने विरोध प्रदर्शन तेज किए हैं। इस मुद्दे पर विपक्ष के कई नेता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात भी कर चुके हैं। इसके अलावा कॅकरोच जनता पार्टी भी विरोध दर्ज कर सड़क पर प्रदर्शन कर रही है।
रिपोर्टों के मुताबिक, विपक्ष ने 1 नवंबर को प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
इस बीच, भाजपा ने विपक्ष के विरोध के बीच राहुल गांधी की विदेश यात्रा को लेकर भी सवाल उठाए हैं। ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त का मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी के केंद्र में बना हुआ है।
दरअसल संसद के दोनों सदनों की बैठक 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई थी, लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी वजह से संसद की संभावित अगली बैठक को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
राजनीतिक हलकों में यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि सरकार महिला आरक्षण कानून में संशोधन से संबंधित विधेयक पर आगे बढ़ने के लिए संसद का विशेष सत्र या विस्तारित बैठक बुला सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू पहले विपक्ष से सहयोग की अपील कर चुके हैं। ऐसे विधेयकों को पारित कराने के लिए संविधान में निर्धारित विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार के पास संबंधित विधेयक पारित कराने के लिए जरूरी समर्थन उपलब्ध है या नहीं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है।
ऐसे में संसद की अगली बैठक, महिला आरक्षण कानून में संभावित संशोधन और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ किसी नए प्रस्ताव पर राजनीतिक तथा संवैधानिक घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है।