West Bengal Assembly Election 2026: बैरकपुर का नाम जेहन में आते ही इतिहास के वो पन्ने स्वतः ही पलटने लगते हैं जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम की गाथा कहते हैं। यह वही पावन भूमि है जहां मंगल पांडे ने आजादी की पहली मशाल जलाई थी और ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। आज दशकों बाद यहां एक अलग तरह का संग्राम आकार ले रहा है जो सीधे तौर पर सत्ता के गलियारों तक पहुंचता है।
उत्तर 24 परगना जिले का यह शहरी इलाका न केवल अपनी औद्योगिक पहचान के लिए मशहूर है बल्कि यहां की बदलती राजनीतिक हवाएं पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। आगामी 29 अप्रैल 2026 को होने वाले मतदान के लिए यहां की जनता एक बार फिर तैयार है। इस बार का चुनाव महज एक सीट जीतने की होड़ नहीं है बल्कि यह पुरानी साख बचाने और नए दावों को पुख्ता करने की बड़ी जंग है। कोलकाता महानगर के करीब होने के कारण यहां की हर हलचल राजधानी की राजनीति को प्रभावित करती है।
बैरकपुर की पहचान केवल इसकी राजनीतिक हलचल से नहीं है बल्कि इसका भूगोल और विरासत भी इसे विशेष बनाती है। हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर बसा यह क्षेत्र कभी अंग्रेजों की सबसे पुरानी छावनियों में से एक हुआ करता था। समय के साथ यहां की ज़मीन ने औद्योगिक क्रांति का दौर भी देखा है। यहां जूट मिलों की लंबी कतारें और रक्षा कारखाने इस बात के गवाह हैं कि यह क्षेत्र कभी बंगाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करता था। हालांकि बदलते वक्त के साथ यहां कई नए व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी उभरे हैं।
रेल और सड़क मार्ग से कोलकाता से अच्छी तरह जुड़ा होने के कारण यहां की आबादी में काफी विविधता देखने को मिलती है। गंगा के मैदानों की उपजाऊ मिट्टी और पुरानी ब्रिटिश इमारतों का संगम यहां के चरित्र को एक अलग ही रंग देता है। पूरी तरह से शहरी मतदाता होने के कारण यहां की समस्याओं और अपेक्षाओं का स्तरभी ग्रामीण इलाकों से काफी अलग और आधुनिक है।
साल 2011 में जब पश्चिम बंगाल में सत्ता का बड़ा परिवर्तन हुआ था तब से बैरकपुर पर तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व कायम है। उस समय शीलभद्र दत्ता ने पार्टी के लिए पहली बार जीत का स्वाद चखा था और 2016 में भी उन्होंने इस जीत को दोहराया। हालांकि राजनीति की करवट ने 2020 में तब नया मोड़ लिया जब सिटिंग विधायक भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद 2021 के चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फिल्म जगत के मशहूर चेहरे राज चक्रवर्ती पर दांव लगाया। राज चक्रवर्ती ने करीब 68,887 वोट हासिल कर भाजपा के चंद्रमणि शुक्ला को पटखनी दी थी। लेकिन हार के बावजूद भाजपा की बढ़ती ताकत ने सबको हैरान कर दिया था। जहां एक तरफ वामपंथ का सूरज यहां धीरे-धीरे अस्त होता दिख रहा है वहीं भगवा दल का वोट शेयर पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ा है। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा का प्रभाव 2016 के 20 प्रतिशत से बढ़कर अब 41 प्रतिशत के पार पहुंच चुका है।
बैरकपुर का चुनावी गणित हमेशा से ही यहां के सामाजिक ताने-बाने पर निर्भर रहा है। यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 17.8 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जाति के मतदाता करीब 7.45 प्रतिशत के आसपास हैं। यह पूरी तरह से एक शहरी सीट है जहां मतदाताओं का मिजाज अक्सर अप्रत्याशित रहता है। एक चिंताजनक बात यहां मतदान के गिरते स्तर को लेकर भी देखी गई है। साल 2011 में जहां यहां भारी संख्या में लोगों ने घरों से निकलकर करीब 78 प्रतिशत मतदान किया था वहीं 2021 तक आते-आते यह आंकड़ा गिरकर 68 प्रतिशत तक सिमट गया। शहरी मतदाताओं की यह उदासीनता अक्सर बड़े राजनीतिक दलों के लिए सिरदर्द साबित होती है। मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग के बीच बंटे इस निर्वाचन क्षेत्र में स्थानीय नागरिक सुविधाओं और रोजगार के मुद्दे हमेशा हावी रहते हैं। जूट मिलों की स्थिति और बुनियादी ढांचे का विकास यहां के लोगों की प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहता है।
जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव की घड़ी नजदीक आ रही है बैरकपुर में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। पिछले परिणामों में जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं रहा है जिससे यह साफ है कि दोनों मुख्य दलों के बीच मुकाबला बराबरी का है। इस बार तृणमूल कांग्रेस के लिए अपने इस पुराने किले को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती होगी। भाजपा की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वाम मोर्चा और कांग्रेस सत्ताधारी दल के वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे।
अगर विपक्षी वोटों का बिखराव होता है तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इस बार जीत और हार का फैसला बहुत कम अंतर से होगा। हर एक बूथ और हर एक मतदाता की अहमियत यहां बढ़ गई है। बैरकपुर की जनता अब उस दिन का इंतज़ार कर रही है जब उनके एक वोट से यह तय होगा कि अगले पांच साल तक उनकी आवाज विधानसभा में कौन बनेगा।