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दिल्ली

Exclusive: भाजपा के संसदीय बोर्ड में आएंगे शिवराज सिंह चौहान और देवेन्द्र फडणवीस ?

भाजपा के संसदीय बोर्ड में बदलाव की तैयारी चल रही है, चार से पांच चेहरे बदलेंगे। संघ का भाजपा को साफ संदेशा है कि बड़े निर्णय संसदीय बोर्ड में ही लें और इन चेहरों की सिफारिश खुद संघ ने अपनी ओर से की है।

शैलेंद्र तिवारी

भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय कार्यकारणी आने के बाद अब संसदीय बोर्ड में बदलाव पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। दरअसल, हर किसी की निगाह इस बात पर संसदीय बोर्ड में किस-किस की एंट्री होगी और किसे बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। संसदीय बोर्ड में आने वाले प्रमुख दावेदारों में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को देखा जा रहा है। दरअसल, इन दोनों चेहरों की सिफारिश खुद संघ के कोटे से आई है। इन चेहरों के सहारे संघ साफ करना चाहता है कि भाजपा के बड़े राजनीतिक फैसलों को सामूहिक तौर पर जवाबदेही के साथ संसदीय बोर्ड में लें। दरअसल, पिछले कुछ सालों में भाजपा के भीतर संसदीय बोर्ड की भूमिका सीमित हो गई है। संघ उसे वापस ताकत के साथ खड़ा करना चाहता है।

भाजपा के वर्तमान संसदीय बोर्ड में 12 सदस्य हैं, जिनमें अध्यक्ष नितिन नवीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, बीएस येदियुरप्पा, सर्बानंद सोनोवाल, के. लक्ष्मण, इकबाल सिंह लालपुरा, सुधा यादव, सत्यनारायण जटिया और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष हैं। इसमें से जिन लोगों के बाहर जाने की संभावना है, उनमें बीएस येदियुरप्पा, के. लक्ष्मण, इकबाल सिंह लालपुरा, सुधा यादव, सत्यनारायण जटिया हैं। हालांकि जेपी नड्डा भी इस सूची से बाहर हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें अध्यक्ष के तौर पर इसमें एंट्री मिली थी। वहीं, राजनाथ सिंह जिस तरह से राजनीतिक हाशिए पर भेजे जा रहे हैं, ऐसे में उनके भी बाहर होने की आशंकाएं हैं। खैर, आशंकाओं और संभावनाओं को छोड़ दें तो भी पांच नाम ऐसे हैं, जिनके बाहर जाने पर कोई संशय शेष नहीं है। अब सवाल यह है कि इनकी जगह पर आएगा कौन?

Devendra Fadnavis (सोर्सः सोशल मीडिया)

मुख्यमंत्री के तौर पर होगी देवेंद्र फडणवीस की एंट्री

अंदरखाने की मानें तो संघ ने संसदीय बोर्ड में एंट्री के लिए दो चेहरों की सिफारिश की है, जिनमें शिवराज सिंह चौहान और देवेंद्र फडणवीस शामिल हैं। लेकिन भाजपा का एक धड़ा दोनों ही चेहरों को शामिल करने के पक्ष में नहीं है। शिवराज सिंह चौहान पहले भी बोर्ड में रह चुके हैं, जब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया... उस वक्त में भी देवेंद्र फडणवीस के नाम की चर्चा हुई थी, लेकिन उन्हें केंद्रीय चुनाव समिति में भेजकर भाजपा ने मामला शांत कर दिया था। अब एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस का नाम संघ की ओर से सबसे आगे है, ऐसे में दूसरे धड़े की ओर से सवाल किए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर अगर देवेंद्र फडणवीस की एंट्री होती है तो फिर दूसरे मुख्यमंत्रियों को भी मौका मिलना चाहिए। जिनमें सबसे प्रमुख नामों में योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्वा सरमा का नाम भी आगे बढ़ाया गया है। तो सवाल यही है कि क्या देवेंद्र फडणवीस की एंट्री हो पाएगी, वो भी तब जब संघ ने सीधे तौर पर संदेशा दिया है कि उन्हें संसदीय बोर्ड में यह नाम चाहिए।

योगी आदित्यनाथ और हिमंता बिस्वा सरमा पर क्या पेंच

योगी आदित्यनाथ की संसदीय बोर्ड में एंट्री पर अभी पेंच है, उन्हें उत्तर प्रदेश तक सीमित रखने की कोशिश है। वहीं हिमंता के लिए चुनौती खुद सर्वानंद सोनवाल हैं। अगर सर्वानांद सोनवाल को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है, तभी हिमंता के लिए कोई संभावना बचेगी। लेकिन सवाल यह खड़ा होगा कि क्या बाहर से आए व्यक्ति को भाजपा इतनी जल्दी अपनी सबसे बड़ी बॉडी में जगह देगी? ऐसे में दोनों के नामों पर विचार होने की उम्मीद काफी कम है।

संसदीय बोर्ड की मजबूती में संघ का संदेश

1. बड़े फैसलों को संस्थागत ढांचे में वापस लाना

संसदीय बोर्ड भाजपा का सर्वोच्च निर्णयकारी बोर्ड है। मुख्यमंत्री चयन, बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक फैसलों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो पिछले कुछ समय में व्यक्ति आधारित हो गई थी, संघ उसे वापस संगठन आधारित बनाना चाहता है।

2. मोदी-शाह केंद्रित निर्णय मॉडल के साथ संस्थागत संतुलन

पिछले वर्षों में भाजपा के बड़े फैसलों को लेकर यह धारणा बनी कि शीर्ष नेतृत्व की भूमिका अत्यधिक केंद्रीय हो गई है। यदि संघ वास्तव में संसदीय बोर्ड को मजबूत करने पर जोर दे रहा है, तो संदेश हो सकता है कि बड़े फैसलों के लिए सामूहिक व्यवस्था को फिर से सक्रिय किया गया है। इससे मोदी—शाह से नाराज धड़े को भी राहत मिलेगी।

3. 2029 से पहले नई राजनीतिक पीढ़ी का चयन

फडणवीस, योगी और हिमंत जैसे नेताओं के नामों की चर्चा यह संकेत देती है कि भाजपा राज्यों के मजबूत नेताओं को राष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा जगह देने पर विचार कर सकती है। वो भी उस वक्त में जब 2029 का चुनाव भाजपा के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा, ऐसे में राज्यों में जनाधार रखने वाली अगली पीढ़ी को आगे लाना होगा।

शिवराज सिंह चौहान, (सोर्स- सोशल मीडिया)

फडणवीस क्यों सबसे मजबूत दावेदार?

  • महाराष्ट्र जैसा बड़ा और राजनीतिक रूप से जटिल राज्य।

  • संगठन और चुनावी रणनीति, दोनों में अनुभव।

  • पहले से केंद्रीय चुनाव समिति का हिस्सा रहे हैं।

  • गठबंधन के नेताओं के साथ तालमेल में बेहतर

  • विपरीत हालात में भी पार्टी के निर्णय के साथ

  • फायदा: फडणवीस की एंट्री उन्हें सिर्फ राज्य का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति तय करने वाले नेताओं की पहली कतार में खड़ा कर सकती है, जो भाजपा को भविष्य में नए नेतृत्व के लिए विकल्प के तौर पर दिखा सकती है।

शिवराज की वापसी क्यों महत्वपूर्ण होगी?

  • लंबे समय तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, संगठन और जनाधार दोनों रखते हैं।

  • केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे हैं, पुराना अनुभव।

  • संभावित वापसी को राजनीतिक पुनर्वास से आगे, केंद्रीय संगठन में उनकी उपयोगिता की स्वीकृति।

  • हिंदी भाषी राज्यों को बेहतर संदेश जाएगा।

  • अनुभव और जनाधार का मिश्रण होगा।

  • फायदा : शिवराज सिंह की एंट्री से मोदी-शाह विरोधी धड़े को थोड़ी राहत मिलेगी। पॉवर बैलेंस का संदेश जाएगा। शिवराज सिंह चौहान 2014 में भी भाजपा के भीतर प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे थे। ऐसे में भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी के बाद का नया विकल्प उपलब्ध होगा।

खैर, अब सवाल यही है कि मोदी—शाह की भाजपा हमेशा अपने निर्णयों से चौंकाती रही है। क्या संसदीय बोर्ड के बदलाव में भी यह फिर से चौंकाएगी या फिर संघ के नामों को बिना किसी विवाद के एंट्री मिलेगी। दरअसल, अगर इन दोनों नामों को बिना किसी चुनौती के एंट्री मिलती है तो फिर तय है ​कि आने वाले वक्त में भाजपा के बड़े फैसले किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि भाजपा के संसदीय बोर्ड से होंगे। अगर इन दोनों के नामों पर ब्रेक लगता है तो फिर भाजपा का यह स्टाइल अभी चलता रहेगा।

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