Rural Child Healthcare Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे गांवों में बचपन की एक ऐसी लड़ाई जारी है। जिसका मुकाबला केवल दवाइयों से नहीं किया जा सकता। यह लड़ाई है कुपोषण के खिलाफ जिसमें बच्चों की सेहत के साथ उनकी मां का पोषण, परिवार की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और गांव तक पहुंचने वाली सड़कें भी अहम भूमिका निभाती हैं।
सरकार कुपोषण दूर करने के लिए योजनाएं चला रही है। अस्पतालों में पोषण पुनर्वास केंद्र यानी एनआरसी संचालित हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मितानिन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें भी जिम्मेदारी निभा रही हैं। इसके बावजूद रायगढ़ जिले के दूरस्थ और पहाड़ी इलाकों में कुपोषण एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।
जिले के विकासखंडों में धरमजयगढ़ ऐसा क्षेत्र है। जहां कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक बताई जा रही है। बरघाट, ऊपर सलखेता, टेढ़ा सेमर, रजिदा, दहीडांड़, चिखलापानी, चाल्हा और चूहीपहाड़ जैसे गांवों में रहने वाले परिवारों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना ही कई बार बड़ी चुनौती बन जाता है।
जंगल, पहाड़ी रास्ते, परिवहन की कमी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं इस लड़ाई को और कठिन बना देती हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने बच्चों को पोषण की जरूरत है बल्कि यह भी है कि जिन बच्चों को सबसे ज्यादा मदद चाहिए, उन तक समय पर मदद पहुंच कैसे रही है?
कुपोषण सिर्फ भोजन की कमी नहीं, बल्कि मां के कमजोर स्वास्थ्य, बीमारियों, अस्वच्छ पेयजल और खराब आर्थिक स्थिति से जुड़ा गहरा मुद्दा है। धरमजयगढ़ के दुर्गम गांवों में उबड़-खाबड़ रास्तों और परिवहन के अभाव के कारण अस्पताल समय पर पहुंचना बहुत कठिन होता है। जागरूकता की कमी से कई बार लोग स्थिति गंभीर होने पर ही इलाज के लिए निकलते हैं।
इसलिए कुपोषण केवल स्वास्थ्य विभाग का नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे, परिवहन और सेवाओं की अंतिम व्यक्ति तक पहुंच का सवाल है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026 के अनुसार भारत 122 देशों में 100वें स्थान पर है, जहां 9.8% आबादी कुपोषित है। सिर्फ योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन और लगातार निगरानी ही इसका वास्तविक समाधान है।
कुपोषण से जूझ रहे बच्चों के उपचार के लिए धरमजयगढ़ और कापू में पोषण पुनर्वास केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों में बच्चों को चिकित्सकीय देखरेख के साथ पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। यहां उपचार का उद्देश्य केवल बच्चे का वजन बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी पोषण संबंधी स्थिति में सुधार करना और परिवार को बच्चे की देखभाल के तरीके समझाना भी है।
एनआरसी में भर्ती बच्चों के साथ उनकी मां को भी रखा जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बच्चों को सामान्यतः 15 से 20 दिनों तक केंद्र में रखकर उनकी स्थिति के अनुसार उपचार और पोषण दिया जाता है। भोजन में दूध, अंडा, दाल, खिचड़ी, दलिया, फल और ऊर्जा से भरपूर आहार शामिल किए जाते हैं। बच्चों की सेहत और जरूरत के अनुरूप उनकी देखभाल की जाती है।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि मां को भी बच्चे के पोषण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। बच्चे को किस तरह भोजन देना है उसकी जरूरतों को कैसे समझना है और उसकी सेहत में सुधार के लिए किन बातों का ध्यान रखना है। इसकी जानकारी दी जाती है। यानी एनआरसी का काम अस्पताल में भर्ती करने और भोजन देने तक सीमित नहीं है। यहां से मिलने वाली जानकारी परिवार के घर लौटने के बाद भी उपयोगी हो सकती है।
हालांकि किसी बच्चे को कुछ दिनों तक केंद्र में रखकर उपचार देना ही पूरी समस्या का समाधान नहीं है। उपचार के बाद भी उसके पोषण की स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। घर में पर्याप्त भोजन की उपलब्धता, नियमित स्वास्थ्य जांच और परिवार की देखभाल संबंधी जानकारी यह तय करने में महत्वपूर्ण हैं कि बच्चे का स्वास्थ्य लंबे समय तक बेहतर बना रहे।
यदि बच्चा अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद फिर उसी परिस्थिति में लौटता है, जहां उसे संतुलित भोजन नहीं मिल पाता या समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं होतीं तो उसके दोबारा कुपोषित होने का जोखिम बना रह सकता है। इसलिए एनआरसी से गांव तक देखभाल की निरंतरता इस लड़ाई का अहम हिस्सा है।
धरमजयगढ़ सिविल अस्पताल के प्रभारी डॉ. बी.एल. भगत के अनुसार दूरस्थ जंगल क्षेत्रों में रहने वाली कई महिलाओं में नियमित पौष्टिक आहार की कमी देखने को मिलती है। इसका असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। उनके मुताबिक कई परिवार बीमारी गंभीर होने के बाद ही अस्पताल पहुंचते हैं।
यह स्थिति मातृ स्वास्थ्य और बाल पोषण के बीच गहरे संबंध को सामने लाती है। बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए केवल जन्म के बाद मिलने वाला भोजन ही नहीं बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत और पोषण भी महत्वपूर्ण हैं। यदि मां को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता नियमित जांच नहीं हो पाती या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समय पर उपचार नहीं होता तो बच्चे के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ने का खतरा बढ़ सकता है।
ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में महिलाओं के सामने कई व्यावहारिक कठिनाइयां होती हैं। स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। घर और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण नियमित जांच के लिए समय निकालना मुश्किल हो सकता है। पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और उन्हें खरीदने की क्षमता भी परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है।
इसलिए कुपोषण की समस्या का समाधान केवल बच्चे को भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह सकता। गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और छोटे बच्चों के पोषण पर एक साथ ध्यान देना जरूरी है। आंगनबाड़ी केंद्रों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और अस्पतालों के बीच बेहतर समन्वय से परिवारों तक समय पर जानकारी और सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं।
सबसे अहम बात यह है कि कुपोषण को परिवार की लापरवाही मानकर छोड़ देने के बजाय उसके पीछे मौजूद वास्तविक परिस्थितियों को समझा जाए। जागरूकता जरूरी है लेकिन जागरूकता तभी प्रभावी होगी जब लोगों के पास सही भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और समय पर उपचार तक पहुंचने के साधन भी हों।
धरमजयगढ़ और कापू के पोषण पुनर्वास केंद्रों को इस वर्ष 480 कुपोषित बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य दिया गया है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए मितानिन, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विभाग की टीमें काम कर रही हैं। इन कार्यकर्ताओं की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे समुदाय के बीच रहकर बच्चों और परिवारों तक पहुंच सकती हैं। बच्चों की पोषण संबंधी स्थिति पर नजर रखना, जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में मदद करना, माताओं को उचित आहार की जानकारी देना और परिवारों को उपलब्ध सरकारी सेवाओं से जोड़ना इस प्रयास के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
लेकिन 480 बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य अपने आप में सफलता का प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह होगा कि कितने जरूरतमंद बच्चों की पहचान हुई कितने बच्चों को समय पर उपचार मिला और उपचार के बाद उनकी सेहत में कितना सुधार हुआ। साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि जिन बच्चों को एनआरसी से छुट्टी दी गई उनकी आगे की निगरानी किस तरह की जा रही है।
किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए आंकड़ों का संकलन जरूरी है लेकिन आंकड़ों के साथ परिणामों का आकलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बच्चों का वजन, लंबाई, उम्र के अनुसार विकास, स्वास्थ्य की स्थिति और उपचार के बाद की प्रगति जैसे संकेतकों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि पोषण कार्यक्रम वास्तव में कितना प्रभावी है।
स्थानीय स्तर पर यदि नियमित समीक्षा हो तो उन गांवों की पहचान की जा सकती है जहां कुपोषण की समस्या अधिक है या जहां बच्चे समय पर उपचार के लिए नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके बाद जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य टीमों के दौरे और पोषण संबंधी सहायता की योजना बनाई जा सकती है।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है। सभी बच्चों की जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। कुछ बच्चों को नियमित पोषण और निगरानी से लाभ मिल सकता है जबकि गंभीर कुपोषण या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे बच्चों को विशेष चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए बच्चों की स्थिति के अनुरूप सहायता सुनिश्चित करना जरूरी है।
धरमजयगढ़ के दूरस्थ इलाकों में कुपोषण के खिलाफ लड़ाई की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक पहुंच का संकट है। बरघाट, ऊपर सलखेता, टेढ़ा सेमर, रजिदा, दहीडांड़, चिखलापानी, चाल्हा और चूहीपहाड़ जैसे गांवों का उल्लेख इस चुनौती को सामने लाता है। पहाड़ी रास्तों और सीमित परिवहन सुविधाओं के कारण इन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए अस्पताल तक पहुंचना कठिन हो सकता है।
किसी शहर या सड़क से जुड़े गांव में रहने वाले परिवार के लिए अस्पताल जाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन दूरस्थ जंगल क्षेत्र में रहने वाले परिवार के लिए यही काम कई चरणों वाली चुनौती बन जाता है। पहले गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचना, फिर उपलब्ध वाहन का इंतजार करना और उसके बाद अस्पताल तक का सफर पूरा करना पड़ सकता है।
आपात स्थिति में यह देरी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कई जगह सरकारी एंबुलेंस भी नहीं पहुंच पाती। ऐसी परिस्थितियों में यह जरूरी हो जाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाते समय गांवों की भौगोलिक स्थिति और परिवहन की वास्तविक कठिनाइयों को ध्यान में रखा जाए।
यदि किसी गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच सकती तो वहां के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या है? क्या स्वास्थ्य विभाग की टीम नियमित अंतराल पर गांव पहुंच रही है? क्या कुपोषित बच्चों की पहचान के लिए समय-समय पर विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं? जरूरत पड़ने पर बच्चे को एनआरसी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन निभाता है? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर पर रहने वाले परिवारों तक किस हद तक पहुंच रहा है।
ऐसे इलाकों में मोबाइल स्वास्थ्य दल, नियमित स्वास्थ्य शिविर, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इन उपायों की सफलता स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और प्रशासनिक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
सड़क और परिवहन की समस्या को केवल विकास का अलग मुद्दा मानकर नहीं देखा जा सकता। जब किसी बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचने में कठिनाई होती है तब यह समस्या सीधे उसके स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ जाती है। इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करना भी कुपोषण के खिलाफ रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।
कुपोषण से निपटने के लिए सरकारी योजनाएं, अस्पतालों में एनआरसी, आंगनबाड़ी सेवाएं और जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मौजूद है। फिर भी धरमजयगढ़ जैसे दूरस्थ क्षेत्रों की परिस्थितियां बताती हैं कि किसी योजना की उपलब्धता और उसका वास्तविक लाभ मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।
किसी गांव में पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध हो सकती है लेकिन यदि परिवार नियमित रूप से स्वास्थ्य केंद्र नहीं पहुंच पाता तो जानकारी का लाभ सीमित रह सकता है। किसी बच्चे के लिए उपचार की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन यदि उसे समय पर केंद्र तक नहीं पहुंचाया जा सके तो व्यवस्था का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसी तरह, अस्पताल में उपचार के बाद यदि परिवार को आगे की देखभाल में सहायता नहीं मिलती, तो बच्चे की सेहत में आया सुधार बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए जरूरत केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाने की नहीं बल्कि उनकी पहुंच और प्रभावशीलता की समीक्षा करने की है। जिन गांवों में कुपोषण अधिक बताया जा रहा है वहां विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बच्चों की नियमित पहचान, माताओं के स्वास्थ्य की निगरानी, पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और उपचार के बाद फॉलो-अप को एक साथ जोड़ना होगा।
स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि भौगोलिक दूरी किसी बच्चे के उपचार में बाधा न बने। इसके लिए गांववार स्थिति का आकलन, परिवहन की समस्या वाले क्षेत्रों की सूची, समयबद्ध स्वास्थ्य शिविर और जरूरतमंद बच्चों तक पोषण सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसके साथ ही कुपोषण से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक और स्पष्ट तरीके से सामने लाना भी जवाबदेही का हिस्सा है। धरमजयगढ़ में कितने बच्चे कुपोषित हैं, कितने गंभीर श्रेणी में हैं, कितने बच्चों को एनआरसी में भर्ती किया गया और उपचार के बाद कितनों की स्थिति में सुधार हुआ इन सवालों के अद्यतन आंकड़े सामने आने से समस्या की वास्तविक तस्वीर समझने में मदद मिलेगी।
जंगल और पहाड़ियों में बसे गांवों में बच्चों की सुरक्षा के लिए सही पोषण, समय पर इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं जरूरी हैं। कुपोषण के खिलाफ यह जंग केवल योजनाओं के भरोसे नहीं जीती जा सकती, बल्कि इसमें परिवार, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की साझा भागीदारी आवश्यक है।
धरमजयगढ़ और कापू के केंद्रों का 480 बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य तभी सफल होगा, जब अंतिम छोर तक मदद पहुंचे। केवल कागजी आंकड़ों से नहीं, बल्कि दुर्गम गांवों के बच्चों तक वास्तविक देखभाल और उपचार पहुंचने पर ही कुपोषण के खिलाफ असली जीत संभव हो सकेगी।