पनका समाज की बेटी ने की थी बस्तर दशहरा की शुरुआत।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की अनोखी कहानी।
काछन देवी की अमर गाथा।
पनका समाज के बुज़ुर्ग ही देवी की करते आ रहे थे सेवा।
Bastar Dussehra Unique Story: बस्तर की पावन माटी में रची-बसी यह कहानी किसी राजा-रानी के वैभव की नहीं बल्कि लोक-संस्कृति, आपसी भाईचारे और आदिम आस्था के उस ताने-बाने की है जिसने सदियों से इस अंचल को एक सूत्र में पिरोकर रखा है। बस्तर अंचल जहाँ की हवाओं में महुआ की महक है और नदियों में सदियों पुराने इतिहास का संगीत। इसी धरती पर मनाया जाता है विश्व प्रसिद्ध 75 दिनों का बस्तर दशहरा जिसकी शुरुआत किसी राजा के हुक्म से नहीं बल्कि एक आम बुनकर यानी पनका (पनिका) समाज की मासूम बेटी की अनुमति से होती है। आइए चलते हैं इतिहास के पन्नों और आस्था के उस जीवंत सफर पर जहाँ राजशाही लोकशाही के सामने नतमस्तक हो जाती है।
यह कहानी सदियों पुरानी है जब बस्तर के घने जंगलों के बीच चालुक्य वंश के राजाओं ने अपनी नई रियासत की नींव रखी थी। राजाओं के पास सेना थी हाथी-घोड़े थे और चमचमाती तलवारें थीं लेकिन इस दुर्गम अंचल पर राज करना इतना आसान नहीं था। यहाँ के असली मालिक तो यहाँ के मूल निवासी गोंड, धुरवा, हलबा, मुरिया और भतरा जनजातियाँ थीं जो जंगलों को अपना भगवान और प्रकृति को अपना घर मानती थीं।
इन्हीं जनजातियों के बीच एक और बेहद सीधा-साधा, शांत और कलाप्रिय समाज रहता था पनका(पनिका) समाज। पनका समाज के लोग आदिवासी तो नहीं थे लेकिन उनका पूरा जीवन आदिवासियों के साथ ही बीतता था। उनका पैतृक काम था करघे पर सूत कातना और कपड़े बुनना। वे बस्तर के आदिवासियों के लिए पारंपरिक पाटा साड़ियाँ, साफे और अंगोछे बुनते थे।
पनका (पनिका) समाज के लोग केवल साधारण बुनकर नहीं थे वे रंगों के जादूगर थे। वे जंगलों से आल के पौधे की जड़ें लाते उन्हें कूटते और उससे एक ऐसा पक्का लाल-मटमैला रंग तैयार करते जो कभी फीका नहीं पड़ता था। जब पनका बुनकर अपने करघे (मंगथा) पर बैठते तो धागों के आर-पार जाने की आवाज खट-खट, खट-खट पूरे गांव में गूंज उठती थी। वे उन कपड़ों पर बस्तर के जंगलों के हिरण, मोर, कछुए और पेड़-पौधों के खूबसूरत मोटिफ्स (आकृतियाँ) उकेरते थे।
आदिवासी समाज अपने तन को ढंकने और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए पूरी तरह पनका(पनिका) समाज पर निर्भर था। इस तरह सदियों से कपड़े के हर एक धागे के साथ पनका(पनिका) और आदिवासी समाज का रिश्ता मज़बूत होता गया। दोनों समाज एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन गए। पनका समाज का एक बड़ा हिस्सा संत कबीरदास का अनुयायी बन गया जिससे वे मांस-मदिरा से दूर सात्विक और पूरी तरह शाकाहारी जीवन जीने लगे जबकि उनका दूसरा वर्ग शक्ति पनका प्रकृति की अदृश्य शक्तियों और ग्राम देवियों की पूजा में लीन रहता था।
समय का चक्र बदला और साल आया लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी का। बस्तर के महाराजा दलपत देव के शासनकाल के दौरान रियासत में एक बड़ी हलचल चल रही थी। राजा चाहते थे कि बस्तर में एक ऐसा महापर्व शुरू किया जाए जिसमें बस्तर की हर एक जाति, हर एक जनजाति और हर एक आम नागरिक शामिल हो सके। वे माँ दंतेश्वरी की आराधना के बहाने पूरे बस्तर को एक सूत्र में बांधना चाहते थे।
लेकिन बस्तर की परंपरा थी कि यहाँ कोई भी बड़ा काम करने से पहले यहाँ की सबसे प्राचीन और उग्र शक्तियों की अनुमति लेना जरूरी था। मान्यताओं के अनुसार जगदलपुर के पास एक ऐसी ही प्राचीन शक्ति का वास था जिन्हें काछन देवी कहा जाता था। काछन देवी युद्ध और सुरक्षा की देवी थीं जो कांटों के आसन पर विराजती थीं।
राजा जानते थे कि काछन देवी की पूजा का अधिकार केवल और केवल पनका (पानिका) समाज के पास है। सदियों से पनका समाज के बुज़ुर्ग ही देवी की सेवा करते आ रहे थे। राजा ने महसूस किया कि यदि बस्तर में सुख, शांति और समृद्धि का पर्व मनाना है तो उन्हें खुद चलकर उस स्थान पर जाना होगा जहाँ एक आम बुनकर समाज देवी की सेवा करता है। यहीं से जन्म हुआ काछन गादी की उस अद्भुत रस्म का जिसने बस्तर के इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया।
बरसात के दिन खत्म हो रहे होते हैं और आश्विन महीने की अमावस्या की काली रात घिरने को होती है। पूरा बस्तर एक अजीब से कौतूहल और उत्साह से भर जाता है। जगदलपुर शहर के एक कोने में स्थित काछनगुड़ी (काछन देवी का छोटा सा मंदिर) को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। मंदिर के चारों तरफ लाल और पीले रंग के कपड़े लहरा रहे होते हैं जिन्हें खुद पनका बुनकरों ने अपने हाथों से तैयार किया होता है। आम के हरे-भरे पत्तों के तोरण और गेंदे के पीले फूलों की महक हवा में घुली होती है। मिट्टी के दीयों की कतारें जल उठती हैं और लोबान व धूप का गाढ़ा धुआं पूरे माहौल को रहस्यमयी और अलौकिक बना देता है।
तभी दूर से एक आवाज़ गूंजती है। मुंडा बाजा, मोहरी और तुड़बुड़ी की तीव्र, भारी थाप हवा को कंपकंपा देती है। हज़ारों-हज़ार आदिवासियों और स्थानीय लोगों की भीड़ काछनगुड़ी को घेरकर खड़ी हो जाती है। सबकी सांसें थमी होती हैं सबकी नजरें मंदिर के प्रांगण के बीचो-बीच रखे एक विशेष आसन पर टिकी होती हैं। यह कोई साधारण आसन नहीं है। यह बेल के पेड़ की उन टहनियों से बना एक झूला है जिसमें इंच-इंच लंबे, नुकीले और ज़हरीले कांटे निकले हुए हैं। इन कांटों को देखकर ही किसी भी आम इंसान की रूह कांप जाए। लेकिन बस्तर की इस माटी में आज कुछ ऐसा होने वाला था जो विज्ञान की समझ से परे और आस्था की पराकाष्ठा था।
तभी भीड़ दो हिस्सों में बंट जाती है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे, माथे पर बस्तरिया मुकुट पहने बस्तर राजपरिवार के महाराजा अपने मंत्रियों और दशहरा समिति के सदस्यों के साथ बड़ी ही विनम्रता से कदम बढ़ाते हुए मंदिर में प्रवेश करते हैं। राजा के चेहरे पर कोई राजसी घमंड नहीं होता बल्कि एक याचक की तरह वे सिर झुकाए चल रहे होते हैं।
गर्भगृह से पनका समाज की एक छोटी सी मासूम कुंवारी कन्या को बाहर लाया जाता है। वह बिल्कुल साधारण बच्ची है जो रोज अपने पिता को करघे पर कपड़े बुनते देखती है। लेकिन आज उसकी आँखों में एक अलग ही तेज है। पनका समाज के बैगा (पुजारी) मंत्रोच्चार शुरू करते हैं अक्षत (चावल) और फूल छिड़के जाते हैं। अचानक उस नन्ही बच्ची के शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा का संचार होने लगता है। वह झूमने लगती है। लोक-मान्यता है कि साक्षात् युद्ध की देवी माँ काछन उस पनका समाज की बेटी के भीतर अवतरित हो चुकी हैं। वह बच्ची अब केवल एक इंसान नहीं बल्कि पूरे बस्तर की रक्षक बन चुकी है।
बाजे-गाजे की धुन तेज़ हो जाती है। देवी रूपी वह नन्ही बच्ची उस भयानक नुकीले कांटों से बने झूले की तरफ बढ़ती है। लोग अपनी आँखें बंद कर लेते हैं लेकिन देवी बिना किसी हिचकिचाहट के बेहद सहजता से उस कांटों के झूले पर लेट जाती है और झूलने लगती है। न तो उसकी त्वचा से खून की एक बूंद टपकती है और न ही उसके चेहरे पर दर्द की कोई शिकन आती है। वह तो एक मंद मुस्कान के साथ कांटों के झूले पर ऐसे आराम करती है मानो वह फूलों की सेज हो। यह दृश्य देखकर पूरा परिसर जय मां काछन, जय दंतेश्वरी के गूंजते जयकारों से दहल उठता है।
अब वह ऐतिहासिक क्षण आता है जिसके लिए पूरी बस्तर रियासत थमी हुई थी। बस्तर के महाराजा हाथ जोड़कर श्रद्धा से अपना सिर झुकाकर उस कांटों के झूले पर बैठी पनका समाज की बेटी के सामने खड़े हो जाते हैं। सोचिए एक दौर वह था जब राजाओं की एक आवाज़ पर लोगों के सिर धड़ से अलग कर दिए जाते थे लेकिन बस्तर की इस पावन धरती पर राजा खुद एक गरीब बुनकर समाज की लड़की के सामने हाथ फैलाए खड़ा था। राजा देवी से प्रार्थना करते हैं- हे माँ बस्तर की सुख-शांति के लिए हम 75 दिनों का दशहरा महापर्व शुरू करना चाहते हैं। कृपा करके हमें यह पर्व निर्विघ्न संपन्न करने की अनुमति दें।
कांटों के झूले पर झूल रही वह नन्ही बच्ची अपनी छोटी सी हथेली आगे बढ़ाती है और राजा की अंजलि में आशीर्वाद के रूप में गेंदे का फूल और प्रसाद डाल देती है। इस फूल का मिलना ही बस्तर दशहरे की हरी झंडी है। यह इस बात की अनुमति है कि अब राजा और बस्तर की जनता मिलकर रथ चला सकते हैं उत्सव मना सकते हैं। यदि पनका समाज की वह बेटी फूल न दे तो बस्तर का राजा चाहे जितनी ताकत लगा ले दशहरा शुरू नहीं हो सकता।
यह दृश्य चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति कितनी महान है। यहाँ की राजशाही कभी निरंकुश नहीं थी। यहाँ का समाज हमेशा से लोकतांत्रिक था जहाँ राजा को भी प्रजा और एक आम शोषित-वंचित समाज की बेटी के सामने झुकना पड़ता था। यह परंपरा इस बात का साक्ष्य है कि पनका(पनिका) समाज इस आदिवासी बहुल इलाके का कोई नया या बाहरी हिस्सा नहीं है बल्कि वह इस धरती के अस्तित्व का मूल आधार है।
काछन गादी की रस्म पूरी होते ही मानो पूरे बस्तर में खुशियों का बांध टूट पड़ता है। इसके बाद शुरू होता है 75 दिनों का वह अंतहीन सिलसिला जिसमें बस्तर की हर एक जनजाति की अपनी एक खास जिम्मेदारी होती है। काछन गादी की अनुमति मिलने के बाद मुरिया जनजाति के लोग जंगलों से विशालकाय साल के पेड़ की लकड़ियाँ काटकर लाते हैं। संवरा जाति के लोग उन लकड़ियों से बिना एक भी लोहे की कील का इस्तेमाल किए औज़ारों की मदद से एक विशाल दोमंजिला रथ तैयार करते हैं। हलबा जनजाति के सिपाही राजा और रथ की सुरक्षा की कमान संभालते हैं। भतरा जनजाति के लोग रथ के आगे-आगे रास्ता साफ करते हैं। और गोंड जनजाति के हज़ारों लोग मोटे-मोटे रस्सों से उस विशाल रथ को जगदलपुर की सड़कों पर खींचते हैं।
इस पूरे महाअभियान के केंद्र में पनका(पनिका) समाज की वह बेटी हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है जिसने अपने त्याग और अपनी आस्था से इस पर्व का द्वार खोला था। दशहरा खत्म होने के बाद भी पनका समाज अपने करघों पर लौट जाता है लेकिन उनका सम्मान बस्तर के लोगों के दिलों में हमेशा सर्वोच्च रहता है।
आज जब हम 2026 के आधुनिक दौर में जी रहे हैं जहाँ दुनिया की बड़ी-बड़ी संस्कृतियाँ और इतिहास किताबों में सिमट कर रह गए हैं वहीं बस्तर की यह अद्भुत परंपरा आज भी वैसी ही जीवंत है। आज भी जगदलपुर की काछनगुड़ी में जब पनका समाज की बेटी कांटों के झूले पर बैठती है तो आधुनिक सरकारें और प्रशासनिक अधिकारी भी वहाँ सिर झुकाए खड़े होते हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि छत्तीसगढ़ की ताकत उसके महलों में नहीं बल्कि यहाँ के आदिवासियों और पनका जैसे पारंपरिक समाजों के आपसी भाईचारे में है। एक बुनकर समाज की बेटी का देवी बनना और राजा को आदेश देना यह साबित करता है कि कला, श्रम और आस्था कभी किसी जाति या सामाजिक ऊंच-नीच की मोहताज नहीं होती। यह बस्तर की माटी का वह गौरवशाली इतिहास है जो कपड़े के हर धागे की तरह आज भी बस्तर के सुनहरे भविष्य को बुन रहा है।