Highlights:
सितंबर 2026 में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% हो गई।
ईंधन और बिजली श्रेणी की महंगाई दर 25.85% पर पहुंच गई।
खाद्य सूचकांक आधारित महंगाई दर सितंबर में 8.66% दर्ज की गई।
निर्मित उत्पादों की महंगाई दर बढ़कर 9.76% हो गई।
Wholesale Inflation India September 2026: भारत में त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही आम जनता के बजट पर महंगाई की मार पड़ती दिख रही है। ईंधन, सब्जियों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में तेजी के बीच एक चिंताजनक खबर सामने आई है। देश की थोक महंगाई दर (WPI) चार वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर दहाई के आंकड़े में प्रवेश कर चुकी है। सितंबर 2026 में थोक महंगाई बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई। इससे पहले सितंबर 2022 में यह आंकड़ा 10.70% दर्ज किया गया था।
यह तेजी केवल खाद्य सामग्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा, ईंधन और निर्मित वस्तुओं के दामों में भी बढ़त देखी गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि उद्योगों के लिए उत्पादन और व्यापार की लागत बढ़ गई है। अग कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो आने वाले दिनों में खुदरा सामान और अधिक महंगे हो सकते हैं।
सितंबर में थोक महंगाई दर 11.39% दर्ज की गई, जो अगस्त में 9.92% और जुलाई में 9.78% थी। इस प्रकार लगातार दूसरे महीने थोक मूल्य सूचकांक में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस उछाल के पीछे मुख्य कारणों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी, महंगी बिजली व ईंधन, खाद्य पदार्थों के दामों में उछाल और निर्मित उत्पादों की बढ़ती लागत शामिल हैं। ऐसे समय में जब आम लोग त्योहारों के लिए खरीदारी की योजना बना रहे हैं, महंगाई का यह रुख उनके बजट को प्रभावित कर सकता है।
सितंबर माह में ईंधन और बिजली श्रेणी की महंगाई दर बढ़कर 25.85% तक पहुंच गई, जो अगस्त में 22.93% थी। कच्चे तेल, नेचुरल गैस, मिनरल ऑयल और कोयले के भावों में बढ़ोतरी इसका प्रमुख कारण रही।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में सालाना आधार पर 57.32% की वृद्धि दर्ज हुई है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। ईंधन के महंगे होने से माल ढुलाई और विनिर्माण लागत बढ़ेगी, जिसका अंतिम प्रभाव ग्रहकों पर भी पड़ सकता है।
इसके अलावा खाद्य वस्तुओं के मोर्चे पर भी राहत नजर नहीं आ रही है। सितंबर में थोक मूल्य सूचकांक के फूड इंडेक्स की महंगाई दर 8.66% रही, जो अगस्त में 7.05% थी। इसके अलावा, प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की दर भी अगस्त के 5.67% से बढ़कर सितंबर में 8.14% हो गई।
त्यौहारी सीजन के दौरान घरों में खाद्य सामग्री और मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में खाद्य महंगाई का उच्च स्तर पर बने रहना आम परिवारों के मासिक खर्च को बढ़ा सकता है।
सितंबर में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर बढ़कर 9.76% हो गई, जो पिछले महीने (अगस्त) में 8.37% थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नई श्रृंखला में यह इस श्रेणी का अब तक का उच्चतम स्तर है। बेसिक मेटल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल, रबर, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में लगने वाले कच्चे माल की लागत बढ़ने से यह तेजी आई है।
त्योहारों में कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और होम अप्लायंसेज की मांग में तेजी आती है। यदि कंपनियों की उत्पादन लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका असर इन सामानों के अंतिम मूल्यों पर दिख सकता है।
थोक महंगाई (WPI) और खुदरा महंगाई (CPI) में अंतर होता है। थोक मूल्य सूचकांक कारोबारी और थोक स्तर पर कीमतों के रुख को दर्शाता है, जबकि खुदरा दर वह होती है जो आम उपभोक्ता सीधे बाजार में सामान खरीदते समय अदा करता है।
कंपनियां अगर बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाने के बजाय ग्राहकों पर डालती हैं, तो आने वाले समय में खुदरा बाजार में भी वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। थोक महंगाई का असर खुदरा कीमतों पर किस सीमा तक और कब दिखेगा, यह कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करेगा।