भंडारा (का). चीनी वायरस के कहर को रोकने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जारी लॉकडाउन ने जहां एक ओर दामाद को आमरस की मेहमानवाजी से वंचित कर दिया है, वहीं दूसरी ओर इस लॉकडाउन ने नवजात शिशुओं को जन्म देने वाली माताओं तथा नववधुओं को भी लॉकडाउन की समयावधि में अपनों से मिलने से वंचित कर दिया.
नहीं चख पाए आमरस का स्वाद
पहले चरण के 21 तथा दूसरे चरण के 19 दिन को मिलाकर 40 दिन के लॉकडाउन में आम के रस का स्वाद बहुत कम लोगों ने ही चखा होगा. इस बार दामाद को सास की ओर से आम का रस खाने के लिए विशेष निमंत्रण इसलिए नहीं दिया गया कि कोरोना के कारण आम का रस खाना कहीं भारी न पड़ जाए. आम के दर इस वर्ष अन्य वर्षों की तुलना में बहुत ज्यादा हैं. विदर्भ में आमरस की खाने की परंपरा है. इसलिए गर्मी का मौसम आते ही आम रस भोजन की मुख्य डिश होती है. अक्षय तृतीया से आम खाने का सिलसिला शुरू होता है और मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ-साथ बड़े घरानों में भी आम रस खाने का सिलसिला शुरू हो जाता है.
WHO के निर्देश
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना नामक महामारी से बच्चों तथा वरिष्ठ नागरिकों को बचाने के प्रति कुछ आवश्यक निर्देश दिए हैं. इसलिए जिन घरों में बच्चों ने जन्म लिया है, या जिन घरों में वरिष्ठ नागरिक हैं, उन घरों के लोगों को लॉकडाउन की कालावधि में कुछ ज्यादा ही सतर्क रहना पड़ा है. कुछ परंपराएं भी तोड़नी पड़ी हैं. नवजात को जन्म देने वाली मां अपने मायके न जाकर ससुराल में ही रहने को मजबूर हो गई. जान है तो जहान है की कहावत को स्वीकार करते हुए इस बार दामाद ने सास की ओर से आम रस के निमंत्रण को ठुकराते हुए यही कहना उचित समझा कि सासू मां इस बार आम रस खाने का निमंत्रण मैं स्वीकार नहीं कर सकता.
हर घर की कहानी
भंडारा जिले के कई घरों में लॉकडाउन की यही कहानी है. 40 दिन के लॉकडाउन के बाद 4 मई से तीसरे चऱण का लॉकडाउन शुरू हो गया है, यह 17 मई तक चलेगा. संभव है कि 17 मई के बाद सब कुछ ठीक हो जाए और उसके बाद आम रस खाने का निमंत्रण मिलने पर उसे स्वीकार करने में दामाद को कोई दिक्कत ना हो और वह माएं भी अपने मायके में आकर अपने नवजात बच्चे का मुंह अपने घर वालों को दिखाने में कामयाब हो जाएं.