By: Simran Singh
NavBharat Live Desk
शुरूआती समय में भारतीय महिलाएँ साड़ी या वस्त्र बिना ब्लाउज़ और पेटीकोट के पहनती थीं। इसे "निवि शैली" या "निवि बंदा" कहा जाता था।
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मुगल काल में महिलाओं के कपड़ों में अधिक शालीनता और शरीर ढकने की परंपरा बढ़ी।
लेकिन तब भी ब्लाउज़ जैसे कपड़ों का आम प्रचलन नहीं था, सिर्फ कुछ क्षेत्रों में अंगिया या चोली पहनी जाती थी।
भारत में ब्लाउज़ पहनने की शुरुआत 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई। ब्रिटिश महिलाओं और मिशनरी स्कूलों में प्रचलित “बॉडिस-जैसे” कपड़ों ने भारतीय पहनावे को प्रभावित किया।
जमुना देवी और बंगाल की उच्चवर्गीय महिलाओं ने सबसे पहले आधुनिक ब्लाउज़ पहनना शुरू किया।
ब्रिटिश अधिकारियों ने भी भारतीय महिलाओं से अनुरोध किया कि सार्वजनिक स्थानों पर “ऊपरी वस्त्र” पहना जाए। इसके बाद बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में ब्लाउज़ का उपयोग बढ़ा।
19वीं सदी के अंत तक पेटीकोट (घाघरा/स्कर्ट) और ब्लाउज़ के साथ साड़ी पहनना एक “सुसंस्कृत और आधुनिक” तरीका माना जाने लगा। धीरे-धीरे यह शैली पूरे भारत में फैल गई।
राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की चोली, दक्षिण भारत की राविका,बंगाल और असम की अलग-अलग शैलियाँ इन सभी को मिलाकर आधुनिक ब्लाउज़ के कई डिज़ाइन विकसित हुए।